रात को घर जाने से डरता हूँ – मानस भारद्वाज की कविताएँ

रात को घर जाने से डरता हूँ
मेरी असफलताएं घेर लेती हैं मुझे
मेरे घर पे
और पूछती हैं वो सवाल
जिनके मेरे पास जवाब नहीं होते

असफलताएं मेरे जीवन में
सबसे सफल रही हैं

रात को घर जाने से डरता हूँ
मेरा बिस्तर मझे जकड लेता है
और मेरी नसों में मौजूद
नींदों में सूईयाँ चुभा देता है

मेरे कमरे में किताबें
अपने पन्ने फडफडा के कहती हैं
हम तुझे कुछ दे नहीं पाई
तेरी तबाही हमारे माथे रही
पर ये बात किसी से कहना मत
दुनिया आदर्शों में जीना चाहती है
और किताबों को आदर्श मानती है
किसी की श्रद्धा को तोडना अच्छी बात नहीं
हमारे खिलाफ कह के तू तो
पूरी दुनिया की श्रद्धा को तोडना चाहता है

किताबें मिन्नतें करती हैं मुझसे अकेले में
कि मैं उनके खिलाफ कुछ न कहूँ
मैं उनकी कमजोरी बयाँ नहीं करूं
सबको लगता है किताबें मजबूती देती हैं
पर किताबों को पता है वो
लचीले धडकते दिल को
और मुलायम बना देती हैं
जबकि ये समय है कठोरता का

किताबें देती हैं संवेदनशीलता
और इस युग में वो सबसे कमज़ोर है
जो संवेदनशील है

किताबे देती हैं श्राप भटकने का
किताबें कहती हैं अपने पढने वालों को
तुम्हारा कभी भला नहीं हो सकता
जिन्होंने किताबों का साथ निभाया है
उन्होंने दुनिया में कुछ नहीं पाया है

ये समय है छल का , कपट का
ये समय है बल का , डपट का
ये वो समय है जहाँ धूर्त सबसे सफल है
और उसका कहीं कुछ नहीं हो सकता
जिसमे थोड़ी सी भी अकल है

यहाँ मूर्ख – मूर्ख को खुश कर रहा है
अजब सी चीख चिल्लाहट है
और कौवों की सभा में
बस सच को छोड़ , हर बात पे संवाद है

रात को घर जाने से डरता हूँ
मुझे सड़कें भाती हैं
बेमतलब ही फिरता रहता हूँ
इधर से उधर तक
उन लोगों के साथ भी रहता हूँ
जिनको मेरा साथ कभी पसंद नहीं रहता
सिर्फ इसलिए
क्योंकि मैं डरता हूँ अकेले रहने से
अकेलापन मुझसे पूछता है वो सवाल
जिसका मेरे पास जवाब नहीं होता

मैं सवालों के जवाबो को टालने वाला रहा हूँ
हमेशा से

रात को घर जाने से डरता हूँ
इसलिए पीता हूँ शराब
हालाँकि मुझे शराब से नफरत है
घिरा रहता हूँ धुए में
मैं सामना नहीं कर पाता होश में
अपने सपनों का
सपने मेरे मुझे खाने की पूरी कोशिश में हैं
किसी दिन मिल गया अकेला सपनों को
तो मुझे तेल में तल के खा जायेंगे

रात को घर जाने से डरता हूँ
घर पे मेरा इंतज़ार कर रही होती है एक माँ
जो मेरी शादी कर देना चाहती है
और एक कुत्ता
जो मुझसे सिर्फ इतना चाहता है
कि मैं उसके सर पे हाथ फेरूँ
कभी कभी उसके गले पे
और फिर उससे बात करूं
मुझे भी लगता है
मेरी बातों को सबसे ज्यादा
मेरा कुत्ता समझता है

रात को घर जाने से डरता हूँ

दादी जिस घर मे रहती थी
उस घर में वाश बेसिन नहीं था
ना ओवरहेड टैंक था
जिससे बाथरूम में पानी आये
न किचन में पानी आता था

एक चूल्हा था जिसमे फूक मारने के लिए
लकड़ी के पोपले डंडे होते थे
मैं जब दिवाली पर जाता था
दादी मुझे ये पोपले डंडे देती थी
मैं इसमें फुलझड़ी लगा के जलाता था
पोपले डंडे मुझे सिर्फ
दादी के घर पर मिलते थे
मैं साल भर वैसे डंडे दादी के घर से दूर
एक शहर में ढूंढा करता था

दादी जिस घर मे रहती थी
उसकी दीवारें बहुत मोटी थी
उनमे जगह जगह आले थे
आज के इंजीनियरिंग वुड की अलमारी वालों को
आलों के बारे में नहीं पता होगा

मैंने उन आलों में जलते दियों के साथ मे
अपने बचपन के मासूम सपने सजाए थे

दादी जिस घर मे रहती थी
उसमे छत पर टीन था
टीन पर पतंगे अटकी थी
मैंने वो अटकी पतंगे
हर साल निकालने की कोशिश की
पर जादू ये है वो सब पतंगे
अब भी मेरे भीतर अटकी हैं
टीन पे जब हवा टकराती है
तो मेरे भीतर कुछ पतंगे लहराती हैं
मैंने ये भी सोचा था
पतंगों के हिलने से हवा चलती है

दादी जिस घर मे रहती थी
उस घर मे कुआ था
और कुए के साथ थे किस्से
कुआ पानी के साथ साथ किस्से देता था
हम किस्सो में नहाते थे
कुए पे दूर से ट्रेन की आवाज़ आती थी
एक इंजन हॉर्न बजाता था
और हम ट्रेन कुए के अंदर
पानी मे ढूंढा करते थे
मैं बरसों तक यही समझता रहा हूँ
कि स्टेशन पर ट्रेन मेरे घर के कुए से आती है

दादी जिस घर मे रहती थी
उस घर में वाश बेसिन नहीं था

मेरा जन्म बुराई करने के लिए हुआ है
घर पर
मैं बहन से बीवी की बुराई करता हूँ
बीवी से बहन की बुराई करता हूँ
माँ से दोनों की बुराई करता हूँ
दोनों से मॉ की बुराई करता हूँ
मेरा जन्म बुराई करने के लिए हुआ है

फ़ोन पर
मैं उससे इसकी बुराई करता हूँ
मैं इससे उसकी बुराई करता हूँ
मैं सुबह उठ के देखता हूँ
किससे किसकी बुराई की जाए
मैं रात को सोने से पहले फ़ोन लगा के
एक से दूसरे की बुराई करता हूँ
दूसरी रात को दूसरे से
पहले की बुराई करता हूँ
मेरा जन्म बुराई करने के लिए हुआ है

मैं बाहर निकलता हूँ
तो घर से सोच के निकलता हूँ
किससे किसकी बुराई करूंगा
मैं जब बुराई करता हूँ तो
सामने वाला साथ मे स्वतः
बुराई करने लगता है
मैं जिसकी बुराई करता हूँ
दूसरे दिन उसी के पास जा के
उसी की बड़ाई करता हूं
और इससे उसकी बुराई करता हूँ
जिससे कल इसकी बडाई की थी

ये चक्कर चलता रहता है
मैं इस चक्कर में केंद्र पे हूँ
पर मैं भी किसी और के
इसी चक्कर का हिस्सा हूँ
कोई और केंद्र में होगा

पृथ्वी उसी चक्कर पे टिकी हुई है
जिसे बुराई करना कहते हैं
जिस दिन बुराई करना बंद होगा
पृथ्वी का बैलेंस बिगड़ जाएगा
मानव जाति का अंत हो जाएगा
मेरा जन्म बुराई करने के लिए हुआ है
पृथ्वी का जन्म बुराई करने के लिए हुआ है
मुझमें ब्रह्म है और मैं ब्रह्म में हूँ
इस ब्रह्मांड का जन्म बुराई करने के लिये हुआ है

मैं वो जैकेट बीस साल से पहन रहा हूं
जो पापा ने मरते हुए पहनी थी

मुझे लगता है पापा की आत्मा का कुछ हिस्सा
इस जैकेट में आ गया जो मुझे हर साल सर्दियों में
अपने जिस्म की गर्मी देता है
पापा की आत्मा के जिस्म की गर्मी …

मुझे लगता है पापा जब अकेले मर रहे थे मसूरी में
तब वो कुछ कुछ इस जैकेट के अंदर जिंदा रहे
उसी तरह से जैसे वो ज़िंदा रहे उनकी
अनगिनत चीजों में
और उन चीजों से उपजी यादों में
और यादों से उपजे वक्त में

मुझे लगता है जैसे जैसे मेरी उम्र बढ़ रही है
ये जैकेट कुछ कुछ पतली हो रही है
मनुष्य साठ साल की उम्र तक
हर साल एक पौंड के हिसाब से वज़न में बढ़ता है
उसके बाद उसका वज़न घटने लगता है
पापा होते तो आज पैसठ साल के होते
पांच साल से ये जैकेट पतली हो रही है

मैं इस जैकेट में खुद को सुरक्षित महसूस करता हूं
इसमें छह जेब हैं जिसमे से दो जेब में
मैं हाथ तब डालता हूं जब मुझे अपने पापा का हाथ
अपने हाथों में लेने की इच्छा होती है
उन दो जेबों में हाथ डालने पर लगता है
मेरे हाथों में गर्मी मेरे पापा के हाथों से आ रही है

ना जाने कितनी यात्राएं मैंने इस जैकेट में करी हैं
इस जैकेट में ना जाने कितनी
यात्राओं की गंध समाई हुई है
हर गंध की एक मेमोरी होती है
ना जाने कितनी मेमोरीज हैं
ना जाने कितनी सर्दियां मैंने कितनी लड़कियों के साथ
इसी जैकेट में गुजारी हैं
कुछ कुछ साल के अंतराल में प्रेमिकाएं बदलती गई
पर ये जैकेट मेरे साथ में रही है
जैसे जैसे ये जैकेट पतली होना शुरू हुई
मेरे ऊपर इसने शादी का दबाव बनाना शुरू कर दिया
मुझे लगता है ये जैकेट अपना जिस्म खत्म होने से पहले
मुझे शादीशुदा देखना चाहती थी
आखरी लड़की जिसकी इस जैकेट की गर्मी के साथ सर्दियों की तस्वीर है
वो मेरी बीवी हो गई
मेरी शादी में मेरे ऊपर दबाव बनाने का बहुत सारा श्रेय
इस जैकेट को जाता है
और अब मेरी बीवी चाहती है मैं ये जैकेट ना पहना करूं …
उसे ये पुरानी लगती है …..

मानस भारद्वाज का जन्म 30 जुलाई 1986 को मध्यप्रदेश के खंडवा में हुआ । पिताजी सरकारी नौकरी में थे इस कारण हर दो साल में एक नए शहर में ठिकाना रहा । 2001 से कविता लेखन में सक्रिय । 2008 से रंगमंच में सक्रिय । कविताओं का नाट्य प्रदर्शन 2008 से हो रहा है ।
नाटकों का निर्देशन , लेखन एवं नाटकों में गीत लेखन
राष्ट्रीय दूरदर्शन एवं दूसरी चैनल्स पर कविता पाठ ।
भारत भवन , साहित्य अकादमी सहित कई मंचों पर कविता पाठ।
हंस , समावर्तन , कृति बहुमत , वनमाली कथा , समय के साखी आदि विभिन्न पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन।
वर्तमान में भोपाल ठिकाना है ।