‘हम नहीं रोनी सूरत वाले’ : सावित्रीबाई फुले की कविताई – बजरंग बिहारी तिवारी

 

जीवन की गहरी समझ के साथ काव्य-रचना में प्रवृत्त होने
वाली सावित्रीबाई फुले (1831-1897) अपने दो काव्य-संग्रहों के बल पर सृजन के
इतिहास में अमर हैं| उनका पहला संग्रह ‘काव्यफुले’ 1854 में तथा दूसरा ‘बावन्नकशी
सुबोधरत्नाकर’ 1891 में प्रकाशित हुआ| दोनों ही संग्रह ज्योतिबा फुले से संदर्भित
हैं| पहले संग्रह में उन्होंने अपने जीवनसाथी फुले के प्रति प्रेमपूर्वक कृतज्ञता
जाहिर की है तो दूसरे में उनकी
प्रामाणिक जीवनी दी है| कविता विधा में जीवनी लिखने का आशय
ब्योरेवार वृत्त निरूपण करना नहीं है अपितु जीवन का सत्व प्रस्तुत करना है| ऐसा
सत्व जो अनुभूत हो| काल की कसौटी पर खरा उतरने वाला हो| ‘बावन्नकशी’ का मतलब ही है
बावन तोले खरा| बावन संख्या वास्तव में इस संग्रह में सम्मिलित बावन पदों की सूचक
हैं| ये पद छः शीर्षकों के अंतर्गत रखे गए हैं- उपोद्घात, सिद्धांत, पेशवाई,
आंग्लाई, ज्योतिबा और उपसंहार| पहले संग्रह
‘काव्यफुले’
में 41 कविताएँ हैं| ये कविताएँ जिस अंतर्दृष्टि के साथ विषयों के जितने बड़े रेंज
को समेटती हैं वह चकित करने वाली बात है|
डॉ.
मा.गो. माळी ने ‘सावित्रीबाई फुले समग्र वाङ्मय’ (मराठी) की अपनी भूमिका में
‘काव्यफुले’ की कविताओं को विषयवार सात वर्गों में रखा है-
1) निसर्ग विषयक- कुल सात कविताएँ, 2) समाज विषयक- ग्यारह कविताएँ,  3)
प्रार्थनापरक- छः कविताएँ,

4)
आत्मपरक- पाँच कविताएँ, 5) काव्य विषयक- दो कविताएँ, 6) बोधपरक- आठ कविताएँ, और 7) इतिहास विषयक- दो कविताएँ| 

     कवि के रूप में सावित्रीबाई की चिंताएं
तात्कालिक से ज्यादा दूरगामी स्वरूप वाली हैं| वे वास्तविकताओं से ही कविता रचना
चाहती हैं| ‘खुळे काव्य व खुळा कवी’ (‘झूठा कवि और फरेबी कविता’, ‘खुळा’ का
शाब्दिक अर्थ ‘पागल’ अथवा ‘सनकी’ होता है|) शीर्षक अपनी रचना में वे कल्पनाजीवी
कवियों पर मीठी चुटकी लेती हैं| कवि कल्पना के बल पर ‘अघटित घटना का सर्जक’ बन
जाता है| वह स्वर्ग-नरक के दृश्य उपस्थित करता है| परियों के शब्द
चित्र बनाता है| कल्पनालोक में ले जाकर
रुलाता-हंसाता है| व्यंग्यात्मक लहजे में सावित्रीबाई लिखती हैं कि कवि के
मानस-पटल पर बनते चित्र में परियाँ मुस्कराती हैं, मीठी-मीठी बातें करती हैं, कवि
को बाहों में भरकर चुंबन लेती हैं| असलियत यह है कि ये परियाँ कवि से प्रेम ही
नहीं करतीं! लेकिन, कवि को मन के लड्डू खाने से कौन रोक सकता है- ‘जवळ घेऊनि
चुंबितसे/ कवीच्या मनी चित्र दिसे|’ इस पारंपरिक कल्पनाप्रसूत काव्यधारा के बरक्स
यथार्थवादी धारा भी है| सावित्रीबाई उसी में आती हैं| काल्पनिक जगत में ले जाने के
स्थान पर वे अपने वास्तविक गाँव (नायगाँव) का शब्दचित्र उकेरती हैं-

मेरी जन्मभूमि

मुझे वंदनीय और दिल
से प्यारी

मैं उसका गौरव गीत
गाती हूँ|

 

बागों में कुएँ और
लुभावने फल-फूल पौधे

पंछी गाते गीत मधुर

रंग-बिरंगी तितलियाँ
मंडराती फूल-पौधों पर

साक्षात् प्रकृति

चहल-पहल करती हर पल|

‘माझी जन्मभूमी’
शीर्षक इस कविता में सावित्रीबाई ने अपनी जन्मभूमि के वर्तमान के साथ सुदूर अतीत
और निकट इतिहास को भी पेश किया है| महाभारत काल में यहाँ बंदर, लोमड़ी और गीदड़ बसते
थे| फिर रट्ठवासियों से यह इलाका आबाद हुआ| रट्ठवासी मराठा किसानों के पूर्वज माने
जाते हैं| इसके बाद आया शिवाजी महराज का युग| उन्होंने कुनबी, मराठों को साथ लेकर
लोकहितकारी स्वराज्य स्थापित किया|

     सावित्रीबाई ने कल्पनाजीवी कवि का मजाक
उड़ाया है लेकिन ‘द्रष्टा कवि’ की भरपूर प्रशंसा की है| उन्होंने इसी शीर्षक से एक
कविता लिखी है| ज्ञानी कवि को उन्होंने द्रष्टा कवि कहा है| ज्ञान का परम प्रेमी
द्रष्टा कवि नव रसों का भण्डार होता है| काव्य की ओजस्विता उसके होंठों से
प्रवाहित होती है| नव-चंडी (उसे) द्रष्टा बनाती हैं| यह देवी ही उसकी जिह्वा पर
बैठकर गाती हैं| यह धवल, मधुर और कल्याणकारी गायन शंभु की जटा से प्रवाहित गंगा की
धारा के तुल्य होता है| पद्म-पुष्प से सुवासित उसका मानस-सरोवर चार विद्याओं और
चौंसठ कलाओं से युक्त तथा नवरत्न रसों से पूरित होता है| यहाँ ‘नव’ श्लिष्ट पद है-
नवीन और नौ दोनों अर्थ देने वाला| ऐसा कवि कभी सोचता है कि वह ‘विश्व’ मित्र है और
उसकी कविता प्रतिसृष्टि है| (वास्तव में) उसकी कविता दिव्य सृष्टि का काव्य है और
उसी से जीवन सुंदर, शिव (मंगलकारी) व सत्य होता है| समृद्ध अर्थच्छवियों वाली यह
कविता परंपरा और आधुनिकता के संधिस्थल पर नवता की ओर अग्रसर है| कवि का ज्ञानी
होना और उस ज्ञान का सोद्देश्य होना इस कविता का अभिनव प्रस्ताव है| जिन चार
विद्याओं का जिक्र इस कविता में है उसका हवाला ‘काव्यमीमांसा’ में मिलता है|  इस ग्रंथ के रचनाकार भारतीय अर्वाचीनता के
प्रस्तावक कवि नवीं सदी के राजशेखर ने काव्य को पाँचवीं विद्या मानते हुए शेष
चारों विद्याओं का इसमें अंतर्भाव माना था| ये चार विद्याएँ हैं- त्रयी
(धर्मशास्त्र), वार्ता (कृषि-शिल्प-वाणिज्य), आन्वीक्षकी (तर्कशास्त्र, दर्शन) और
दंडनीति (राजनीतिशास्त्र)| इन विद्याओं का ज्ञान ‘द्रष्टा कवि’ होने की पूर्वशर्त
है| ज्ञान की सोद्देश्यता का आशय है जनकल्याण की भावना| कवि की वाणी गंगा की तरह
सबका हित करने वाली हो- यह संत काव्य-धारा का निचोड़ है| जो स्वार्थों के परे देख
सकता/सकती हो वही ‘द्रष्टा’ है| द्रष्टा कवि ही सत्य, शिव और सुंदर अर्थात् ‘मधुर’
काव्य रच सकता है| ‘सत्य, शिव और सुंदर’ सावित्रीबाई की प्रिय कसौटी है|

     कथा है कि विश्वामित्र ने प्रतिसृष्टि
अर्थात् इस जगत के समानांतर दूसरे विश्व की रचना कर दी थी| सावित्रीबाई उसका संकेत
करते हुए द्रष्टा कवि को भी ‘विश्व’ मित्र के रूप में देखना चाहती हैं- “कधी कल्पी
मी “विश्व” मित्र आहे/ काव्य माझे हे प्रतिसृष्टी आहे”| विश्व शब्द को
इनवर्टेड कॉमा में रखने का क्या आशय होगा? यह कि इसे विश्वामित्र वाले मिथक से
भिन्न समझा जाए और इससे संसार का हित चाहने वाले विश्व-मित्र कवि का तात्पर्य लिया
जाए| “दिव्य सृष्टीचे काव्य हे तयाचे” (दिव्य सृष्टि है उसका काव्य) -ऐसी कविता की
दिव्यता का तर्क सत्य, सुंदर और मंगलकारी जीवन की कामना-संभावना से उपजा है| वाणी
की देवी सरस्वती को हटाकर ‘नव-चंडी’ को ले आना सावित्रीबाई की अपनी सूझ है| यह
‘नव-चंडी’ ही कवि पर वरदहस्त रखती है और उसे सामान्य कवि से द्रष्टा कवि बनाती है|
मूल कविता में विश्व के अतिरिक्त दो अन्य शब्दों को भी इनवर्टेड कॉमा में
रखा गया है- द्रष्टा और मधुरा| इसका मतलब है कि ये कवि के
बीज शब्द हैं और इनका विशिष्ट अर्थ लिया जाना चाहिए| ‘द्रष्टा कवि’ दिंडी
काव्यवृत्त में लिखी गई कविता है| चार चरणों वाला दिंडी मात्रिक छंद है| इसके
प्रत्येक चरण में 19 मात्राएँ होती हैं| नवें और दसवें पर यति का विधान रहता है|

     कृतज्ञता-बोध सावित्रीबाई के कवि-व्यक्तित्व
का उल्लेखनीय पक्ष है| यह बोध उन्हें परंपरा से जोड़ता भी है और अलगाता भी है| वे
अपने पुरखों का स्मरण करती हैं और बलिराजा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती हैं-

 “त्यांना पदोपदा बंदू|

 वंशज त्यांचे आपण|

 तू पुण्यात्मा बळीराजा|

 स्त्रोत गाती तुझे जन|”

 ‘बळीचे स्तोत्र’ शीर्षक यह कविता अनुष्टुभ छंद
में है| ‘काव्यफुले’ संग्रह की कुल आठ कविताएँ इस छंद में हैं| अर्धसमवृत्त
अनुष्टुभ या अनुष्टुप छंद में चार चरण (पाद या मराठी में ओळी) होते हैं| प्रत्येक
चरण में आठ वर्ण या अक्षर होते हैं| पाँचवाँ वर्ण लघु तथा छठा गुरु होता है|
सातवाँ अक्षर पहले और तीसरे चरण में दीर्घ तथा दूसरे और चौथे चरण में ह्रस्व होता
है| इसी छंद में उन्होंने छत्रपति शिवाजी का श्रद्धापूर्वक स्मरण किया है|
शूद्रादि-अतिशूद्रों के हमदर्द शिवाजी का गुणगान करती हुई सावित्रीबाई कहती हैं कि
उनकी जगह इतिहास में सुरक्षित है जबकि राजा नल, युधिष्ठिर आदि का पुण्यस्मरण
पुराणों में है| सावित्रीबाई की स्त्री-चेतना का परिचय उनकी ‘राणी छत्रपती
ताराबाई’ शीर्षक कविता से मिलता है| ताराबाई भोंसले (1675-1761) छत्रपति शिवाजी के
दूसरे पुत्र राजाराम की पत्नी थीं| पति की मृत्यु के समय उनके पुत्र शिवाजी तृतीय
की उम्र मात्र 4 वर्ष थी| ताराबाई ने अपने पुत्र को गद्दी का वारिस घोषित कर मराठा
राज्य का शासनसूत्र स्वयं संभाल लिया था| उनके शासनकाल (1700-1707) में मराठों ने
शक्ति अर्जित की, तमाम सफल युद्धों में संपदा बटोरी और औरंगजेब की सेना को लगातार
कड़ी टक्कर दी| ऐसी वीरांगना स्त्री की वंदना करती हुई सावित्रीबाई कहती हैं-

“ताराबाई माझी
मर्दीनी

 भासे चंडिका रणांगणी

 रणदेवी ती श्रद्धास्थानी

 नमन माझिये तिचिया चरणी||”

     सावित्रीबाई ने जिसके प्रति सबसे ज्यादा कृतज्ञता
ज्ञापित की है वे हैं ज्योतिबा फुले| फुले को लिखे उनके तीन पत्र मिलते हैं| इन
पत्रों के संबोधनों और कैफ़ियत से ज्योतिबा के प्रति उनके गहरे सम्मान और अनुराग का
पता चलता है| अपने पहले काव्य संग्रह की ‘अर्पणिका’ लिखते हुए तेइस वर्षीया कवयित्री
ने हृदय की विशालता व अकुंठ कृतज्ञता का परिचय दिया है| यह अर्पण जोतिबा के साथ
सभी ‘सुजन हितकारियों’ के प्रति है| वसंततिलका छंद में रचित इस ‘अर्पणिका’ का
भावार्थ है-

 ‘मुझ पर है सबका असीम स्नेह

 महसूस कर हृदय भर आता

 इतने अगाध स्नेह की मैं हकदार नहीं

 आपके उपकारों और सहृदयता को पाकर

 अर्पण करती हूँ अपनी काव्यमाला|’

 ‘संसाराची वाट’ (संसार का मार्ग) शीर्षक कविता
में वे जोतिबा को अपने जीवन में वही स्थान देती हैं जो स्थान पुष्प में पराग का
होता है| वे जोतिबा के संदेश को ‘अपने मन के भीतर सहेजकर रखती’ हैं| ‘जोतीबानां
नमस्कार’ (जोतिबा को नमस्कार) में वे जोतिबा को ज्ञानामृत प्रदाता कहती हैं|
शूद्रों, अतिशूद्रों को उनके उद्धारक ज्ञान की जरूरत है| ‘जोतिबाचा बोध’ (जोतिबा
का मार्गदर्शन) कविता में वे सेवाभाव को इंसान का मुख्य गुण मानती हैं| यह ज्ञान
उन्हें जोतिबा के सान्निध्य ने दिया है- “ऐसा बोध देती| अनुभवे जोती| मनात ठेविती|
सावित्री मी|” माँ के प्रति उनके मन में गहरा प्रेम है| अपनी यादों में उन्होंने
माँ की मेधा, ममता, मजबूती और मेहनत की छवियाँ संजोकर रखी हैं|  अष्ट मात्री छंद में रचित ‘आमची आऊ’ (हमारी माई)
में वे माँ की अपार मेहनत और दयालुता का स्मरण करती हैं| उनके लिए माँ अक्षय ऊर्जा
की स्रोत हैं- “जैसे मूर्तिमंत साक्षात्/ विद्या की शक्ति/ हृदय के भीतर हमने उसे
रखा है|”   

     सावित्रीबाई के पहले काव्यसंग्रह में वैयक्तिक
अनुभूतियों की प्रधानता है तो दूसरे संग्रह में सामुदायिक उत्थान की चिंता का स्वर
मुख्य है| बड़ी सतर्क वैचारिकी के साथ उन्होंने जोतिबा को संत परंपरा से जोड़ा है|
यह जुड़ाव फुले को ‘महात्मा’ कहे जाने को औचित्य प्रदान करने के लिए नहीं है बल्कि
भारत के जनबुद्धिजीवियों की पहचान कराने के लिए है| ‘संत’ शब्द लोक परंपरा में
जनबुद्धिजीवी (पब्लिक इंटेलेक्चुअल) का पर्याय है| सावित्रीबाई स्पष्ट करती हैं कि
उनके लिए संत का आशय आध्यात्मिक प्रवचन करने वाला व्यक्ति नहीं है| संत वह है जिसकी
कथनी और करनी में फर्क न हो- ‘वाचे उच्चारी| तैसी क्रिया करी’| संत वह है जो परमार्थ
कार्य में संलग्न रहे, स्वार्थ से परिचालित न हो-

“सुख दुःख काही|

स्वार्थपणा नाही

परहित पाही|

तोच थोर||”

 जिसे दूसरे का उत्कर्ष काम्य हो और, “इंसानियत
का रिश्ता/ जो जानते-पहचानते हैं/ सावित्री कहे, वे ही हैं सच्चे संत” (‘तेच
संत’/वे ही सच्चे संत)| अपने दूसरे संग्रह (‘सुबोध रत्नाकर’) में उन्होंने
स्मृतिशेष जोतिबा को संत तुकोबा के समान बताया है- “तुकाराम जैसा तसा संत जोती/
सुधा ज्ञान देई जना रीतिभाती”| अपने अभंगों में खरी-खरी बात लिखने वाले संत तुकोबा
जनता के चित्त में जीवंत उपस्थिति हैं| तुकोबा का कथन है- “आम्हां घरीं धन
शब्दाचीं च रत्ने| शब्दाची च शस्त्रे यत्न करूं||” –‘हमारे घर में शब्द ही संपत्ति
है| हमारा रत्न धन सब कुछ वही है| हम इन शब्दों से यत्नपूर्वक शस्त्र भी तैयार कर
सकते हैं और समय पड़ने पर उनका उपयोग भी कर सकते हैं|’ संत तुकोबा या तुकाराम का
उल्लेख जोतिबा ने अपने ग्रंथ ‘किसान का कोड़ा’ (प्रकाशन वर्ष 1883 ई.) में किया है|
वे लिखते हैं कि धूर्त पुरोहितों ने षड्यंत्र करके तुकाराम और शिवाजी के मध्य
स्नेह-भाव विकसित ही नहीं होने दिया| किसान परिवार में पैदा हुए तुकाराम किसानों
के बीच उत्पन्न शिवाजी राजा को किसानों की भलाई के लिए समझा सकते थे, ब्राह्मणों
के चंगुल से बाहर आने का रास्ता सुझा सकते थे| जोतिबा की ही तरह डॉ. आंबेडकर के मन
में भी संत तुकाराम के प्रति बड़ा सम्मान भाव था| उनके द्वारा प्रकाशित मराठी
पाक्षिक ‘मूकनायक’ के प्रथम पृष्ठ के शीर्ष पर संत तुकाराम का अभंग छपता था|
इस अभंग की एक पंक्ति है- “नव्हे जगीं कोणी
मुकियाचा जाण|” – ‘मूक लोगों की जगत में कोई नहीं सुनता|’
कहने की जरूरत नहीं, पाक्षिक के नामकरण में
तुकोबा की यह पंक्ति आधार बनी है| सत्यशोधक समाज की पत्र-पत्रिकाओं में भी शीर्ष
स्थान पर संत तुकाराम की रचित अभंगों की पंक्तियाँ लिखी होती थीं| शास्त्र-प्रमाण
की जगह विवेक को प्रमाण मानने वाले सत्यधर्मी लोग तुकोबा की यह सूक्ति प्रस्तुत
करते थे- ‘सत्य असत्याशी मन केले ग्वाही|’ –सत्यासत्य निर्धारण के संबंध में मन की
गवाही (अंतिम) मानी जाए|    

     भारत का दलित स्त्री साहित्यान्दोलन उचित ही
सावित्रीबाई को अपनी पुरखिन मानता है| दलित साहित्यान्दोलन के पहले दौर में आक्रोश
की प्रधानता है, आवेगमय अभिव्यक्तियों की अधिकता है, संघर्ष के नारे हैं, अवसाद के
चिह्न हैं और प्रहारात्मक रूखी भाषा है| जैसा जीवन होगा, अभिव्यक्ति वैसी ही होगी –यह
इस दौर के रचनाकारों का सच है, तर्क भी है| दलित स्त्री रचनात्मकता इस साहित्यान्दोलन
के दूसरे दौर में संगठित रूप से उभरती है| यह दौर पहले दौर से कई अर्थों में भिन्न
है| आंदोलन में दृढ़ता के स्तर पर कमी नहीं आती है परंतु आक्रोश भरा तेवर बदल जाता
है| जीवन में सिर्फ रूखापन नहीं है- यह बात व्यक्त होने लगती है| अब तक दलित
आंदोलन की नींव डालने वालों में फुले-आंबेडकर की ही चर्चा होती थी| अब सावित्रीबाई
का नामोल्लेख होने लगता है| उनकी कविताएँ अनूदित होने लगती हैं, उद्धृत की जाने
लगती हैं| सावित्रीबाई फुले की कविताएँ इस तथ्य का समर्थन करती है कि दलित
स्त्रियों ने बहुत सोच-समझकर उन्हें अपनी पुरखिन स्वीकार किया है| सावित्रीबाई को
अवमानना, हिंसा और यातना कम नहीं झेलनी पड़ी थी| सवर्णों ने उन्हें लगातार
अपशब्दों-गालियों से भेदा, व्यथित किया था| उन पर ढेले, कीचड़ और गोबर फेंके थे|
उनका जीना दूभर कर दिया था| दूसरी तरफ उन्हें अपने कुनबे से भी विरोध झेलना पड़ा
था| मायके में भाई अंट-शंट बोलता है और ससुराल में ससुर धमकाकर घर से बहिष्कृत कर
देते हैं| इतने तनावों, इतनी प्रतिकूलताओं के बावजूद उन्होंने अपनी सहजता
बनाए-बचाए रखी| जीवन को उत्सव की तरह देखा| आनंद के स्रोतों को ओझल नहीं होने
दिया| ‘काव्यफुले’ संग्रह में प्राकृतिक सौंदर्य पर सात कविताएँ सतरंगी प्रिज्म की
तरह झिलमिला रही हैं| शीतल समीर की सरसराहट, मिट्टी की सुगंध, तितलियों की रंगीनी
और फूलों का खिलना सब सावित्रीबाई को आकर्षित करते हैं| वे सबको अपनी कविता का
विषय बनाती हैं| उनका जीवनोत्सव अक्षुण्ण रहता है| इससे उनकी संघर्ष क्षमता का
संवर्धन होता रहता है| जीवन को इतनी गहराई से चाहने वाली कवयित्री पुणे के आसपास
फ़ैली प्लेग की महामारी में दूसरों का जीवन बचाने के लिए घर-घर, गली-गली घूमती हैं|
यह जानते हुए कि प्लेग संक्रामक बीमारी है वे मरीजों की सेवा करती हैं| गंभीर
मरीजों को अपने पोष्य-पुत्र यशवंत के क्लीनिक लाती हैं| उनके इलाज की व्यवस्था
करती हैं| इसी तरह सेवा करते हुए उन्होंने एक मरणासन्न (महार) बालक को सड़क किनारे
पड़ा देखा| उसे दवाखाने लेकर आईं| प्लेग-पीड़ित रोगियों के सतत संपर्क में रहने से अंततः
उन्हें भी प्लेग हुआ| सिर्फ 66 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई| उन्होंने खुद
को उत्सर्ग कर दिया| बड़ा उदात्त संतत्व है यह! शब्द-कर्म, सिद्धांत-व्यवहार की
एकता का अप्रतिम उदाहरण|

     ‘मेरा
गाँव, मेरी जन्मभूमि’ कविता में जीवनराग में पगा उनका उच्च स्वर उद्घोष है- “हम
नहीं रोनी सूरत वाले|” रोनी सूरत से बचना है तो ‘फूल खिलाना’ होगा- सावित्रीबाई की
जन्मभूमि उनसे यही कहती है| ‘काव्यफुले’ शीर्षक में आया ‘फुले’ श्लिष्ट शब्द है-
फूल और फुले दोनों का वाचक| महान राजा बलि के वारिस होने के नाते यह उनका दायित्व
है- “आम्ही तयांचे वंशज रडगाणे नच गाणारे/ जन्मभूमिही मला सांगते फुले कराया ती/
तीच उधळते मी तिजवरती||” ‘रडगाणे नच गाणारे’ को जैसे आगामी दलित स्त्री
साहित्यान्दोलन का आधार वाक्य बनना था| ‘रडगाणे नच गाणारे’ का आशय है- हम रोंदू
गीत गाने वाले (लोग) नहीं हैं, हम रोना नहीं रोते, हम अपनी व्यथा का प्रदर्शन नहीं
करते, हम रोनी सूरत वाले नहीं हैं| दलित स्त्री कविता का रागात्मक जीवनबोध, सौंदर्य-दृष्टि,
सकारात्मक अतीत-स्मरण, आशावादी आंदोलनधर्मिता और सृजन में विश्वास का सिरा
सावित्रीबाई से जुड़ा है|

     ‘सावित्री-जोतिबा संवाद’ शीर्षक कविता बातचीत
की शैली में है| इसी के अनुरूप अभंग छंद में कविता रची गई है| ‘अभंग’ का आविष्कार
तेरहवीं सदी के वारकरी संतों ने किया था| सत्रहवीं सदी के संत तुकाराम ने अपने
सारे वचन अभंग में ही कहे
और इस छंद को जन-जन
तक पहुँचाया|| अभंग वर्णवृत्त या आक्षरिक छंद है| अक्षरों की गिनती में लचीलापन
लिए हुए| अभंग दो चरणों और चार चरणों वाले होते हैं| दो चरणों वाले अभंग के प्रत्येक
चरण में 8-8 अक्षर होते हैं| अंत में यमक होता है| चार चरणों वाले अभंग के प्रथम
तीन चरणों में 6-6 अक्षर तथा अंतिम पाद में चार अक्षर होते हैं| दूसरे और तीसरे
चरणों में यमक का पुट रहता है| ‘काव्यफुले’ के अभंग चार चरणों वाले हैं| संग्रह
में ‘सावित्री व जोतिबा संवाद’ को आख़िरी (इकतालीसवीं) कविता के रूप में रखा गया
है| इस संवाद में सावित्री कहती हैं कि चंद्रमा अस्त हो चला है, सूरज का उजाला फैल
गया है| जोतिबा का जवाब है- “पर रात बीती बेहद दुःख में!” (‘रजनी ती कष्टी| झाली
फार||’)  इस पर सावित्री टिप्पणी है- “उल्लुओं
की इच्छा एक ही होती है/ कि कर दें सूरज पर अभिशापों की बौछार|” (‘घुबडाची इच्छा|
अशीच असते|| देतते सूर्याते| शाप शिव्या||’) लेकिन, उल्लुओं की चाहत से क्या
सूर्योदय नहीं होगा? सूर्य उगा| ‘शूद्रादि महार जाग गए’| यह उत्सव की बेला है|
ऊर्जा सहेजने का समय है| जोतिबा कहते हैं-

“चलो, हम दोनों जाएँ
बाग़ की ओर

 देखें प्रकृति की शोभा…

तितलियों को देखो,

मंडराती फूलों पर

पंछी पेड़ों पर बैठे
चहक रहे हैं|

ठंडी ठंडी हवा बहती
है

खिल उठी है सारी
सृष्टि|”

शूद्रातिशूद्रों
(दलितों) के जागरण से ही सृष्टि का खिलना भासमान हो रहा है| अभिधा और व्यंजना को
काव्य-रसायन से जोड़ने का काम सावित्रीबाई करती हैं| फूलों का खिलना और (महार आदि)
दलित समुदायों का जागृत हो जाना फुले-दम्पती की प्रसन्नता का हेतु है| जोतिबा का
कथन है कि अज्ञानता की वजह से दीन-दलितों को दुःख झेलना पड़ा| जानवरों की भांति
जीना पड़ा| उल्लू यही चाहते भी थे- “दीनदलितांनी| अज्ञान सहावे|| अमानुष व्हावे|
घुबडेच्छा||” महार-मांग आदि जातियों के लिए ‘दीन-दलित’ पदबंध का प्रयोग ध्यातव्य
है| दलित जागरण के बाद मुक्ति-संघर्ष का नया अध्याय आरंभ होने पर पदबंध में आया
‘दीन’ गायब हो जाता है और उसकी जगह ‘पैंथर’ आ जाता है| मगर, इस प्रक्रिया को घटित
होने में एक शताब्दी बीतती है| सावित्री के संवाद में उचित ही जोतिबा को ज्ञान का
सूर्य कहा गया है जिसके उदय से कालरात्रि का अवसान हुआ है| कविता का अंत
सावित्रीबाई इन शब्दों में करती हैं- “जाऊ चला गाठू| मानवता केंद्र|| मनुष्यत्व
इंद्र| पदी जाऊ||” –

‘चलिए, मेरे संग आगे
बढ़ें

पाएँ मिलकर मानवता
की मंजिल

और मानव होने के

सर्वोच्च पद पर
पहुँचें|’

     प्रकृति पर लिखी कविताओं से सावित्रीबाई की
सूक्ष्म पर्यवेक्षण क्षमता का पता चलता है| उनकी निसर्ग विषयक कविताओं को पढ़े बिना
उनका जीवन दर्शन नहीं समझा जा सकता| परवर्ती काल में जिस दलित कविता का उदय हुआ वह
बहुलांश में या तो विचार कविता है या फिर अनुभव कविता| विचार और अनुभव दोनों ही
सांद्र आक्रोश में घुले हुए आते हैं| पर्यवेक्षण और अनुभव का अंतर समझा जाना
चाहिए| अनुभव को समाज-सापेक्ष माना जाए और पर्यवेक्षण को प्रकृति-सापेक्ष|
अस्मितावादी आंदोलन और ‘विचारधारा’ के आग्रह से पर्यवेक्षण प्रसूत काव्य-रचना को
सराहने में हिचक महसूस की जाती रही है| एक अघोषित-अनकही बंदिश का अहसास बना रहता
है और कविगण निसर्गपरक काव्य-रचना की तरफ नहीं मुड़ते| सावित्रीबाई का समय आंतरिक
प्रतिबंधों का न होकर बाह्य अवरोधों का था| बाह्य अवरोधों से पार पाना कम कठिन
नहीं होता है| सावित्रीबाई का अदम्य साहस पराभूत नहीं हो सकता था| उन्होंने अकुंठ
भाव से निसर्ग-सुषमा का अवलोकन किया| उसके सौंदर्य पर मुग्ध हुईं| जीवनोल्लास के
छंद रचे| उनका कहना है कि मानव और निसर्ग दो भिन्न अस्तित्व नहीं हैं| ये एक ही
सिक्के के दो पहलू हैं| हम सृष्टि के सारे जीवों को एक समझें और उनमें मानव-समुदाय
को प्रकृति की अमूल्य निधि जानकर उसकी कद्र करें- “मानवप्राणी निसर्गसृष्टी द्वय
शिक्क्याचे नाणे| एकच असे ते म्हणुनि सृष्टीला शोभवु मानव लेणे|” उनकी कविता ‘माटी
का गीत’ (‘मातीची ओवी’) मिट्टी के रंग और शेड्स की पहचान करती है| मिट्टी का
वैविध्य उन्हें आह्लादित करता है| इसी से उसके उपयोग की विविधता संभव होती है| उत्पादक-वर्ग
के सौंदर्यबोध के निर्माण में उपयोगिता की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है|
सावित्रीबाई का सौंदर्यबोध यद्यपि उपयोगिता की सीमारेखा को लांघता रहता है| मिट्टी
की महिमा का गायन करते हुए वे गहन साहचर्य को इसका हेतु बताती हैं- “मिट्टी की
महिमा कैसे बताऊँ?/ मिट्टी से नाता हमारा, खेत-खलिहानों जैसा|” जैसे खेत का खलिहान
से संबंध होता है वैसे ही मिट्टी से उनका नाता है- अटूट और अंतरंग| ओवी छंद
लोकगीतों के लिए प्रयुक्त होता है और (साहित्यिक) ग्रंथों के लिए भी| अनुष्टुप (या
अनुष्टुभ) से विकसित यह छंद स्फुट गीतकारों, लोकगायकों तथा ग्रंथकारों,
प्रबंधकारों में समान रूप से लोकप्रिय रहा है| ‘ज्ञानेश्वरी’ और ‘दासबोध’ जैसे ग्रंथ
ओवी में हैं| लोकगीतों वाला ओवी स्त्रियों का प्रिय छंद रहा है, उनके मनोभावों का
कोश| यह दो, तीन, साढ़े तीन तथा चार चरणों वाला होता है| ‘मातीची ओवी’ साढ़े तीन चरणों
वाली है| इस ओवी के अतिरिक्त उनकी तीन अन्य कविताएँ भी इसी छंद में हैं| सभी साढ़े
तीन चरणों वाली| इस छंद प्रत्येक चरण में छः अक्षर होते हैं और आधे चरण में चार-

“मातीचा महिमा|

सांगावा किती हा|

मातीचे नाते अहा|

शिवारात||”  

     मनुस्मृति में कृषि को शूद्रों का कार्य
बताया गया है| खेती का काम त्रैवर्णिकों, विशेषकर ब्राह्मणों के लिए वर्जित है|
शेतकर अर्थात् किसान के अपमान का प्रश्न उठाते हुए सावित्रीबाई ने मनु के प्रति
आक्रोश व्यक्त किया है-

 “हल जो चलावे, खेती जो करे

वे होते हैं मूर्ख-
ऐसा कहे मनु| …

शूद्रों का जन्म

फल है पूर्वजन्म के
पापों का

उन्हें इस जन्म में
चुकाते हैं सभी शूद्र

विषमता का रचते

समाज के कुटिल
रीति-रिवाज

धूर्तों की है यह
नीति अमानवीय|”

(‘मनु म्हणे’/कहे
मनु)

मनु से उलट संतों की
परंपरा में अपनी कविताएँ रचती हुई सावित्रीबाई खेती को ‘ब्रह्मवंती’ =साक्षात्
ब्रह्म कहती हैं| यह मनुवादी विधान का नकार है| कृषिकार्य का उदात्तीकरण है|
किसानों के मनोबल का उन्नयन है-

“खेती ही

 साक्षात् ब्रह्म है

 अन्न धान देती है

 अन्न को कहते हैं परब्रह्म

 शूद्र करे खेती

 और खाते हैं निठल्ले|”

साढ़े तीन चरणों वाली
ओवी में निबद्ध ‘ब्रह्मवंती शेती’ कविता का समापन सावित्रीबाई मौलिक सूझ के साथ
करती हैं- “जे करिती शेती| विद्या संपादती| तया ज्ञानवंती| सुखी करी||” –‘जो करते
हैं खेती/ और ज्ञान की करें प्राप्ति/ वे बने ज्ञानी/ सुख-समृद्धि से भरपूर|’ खेती
करने वाले शिक्षित हों, ज्ञानी बनें –यह इच्छा महात्मा फुले की भी थी| 1882 में शिक्षा
व्यवस्था में सुधार हेतु सुझाव देने के लिए बने हंटर कमीशन के समक्ष जोतिबा फुले
ने विस्तार से अपना पक्ष रखा था| इसमें उन्होंने किसानों की शिक्षा का मुद्दा
उठाया था| वे चाहते थे कि ग्रामीण स्कूलों में जो अध्यापक नियुक्त किए जाएँ वे
किसान परिवारों के हों| इससे शूद्र अतिशूद्र परिवारों से आने वाले बच्चे अपने
शिक्षक के साथ घुलमिल सकेंगे और शिक्षक भी उनकी समस्याओं, जरूरतों को ठीक से समझ
सकेंगे| इसके विपरीत ब्राह्मण जाति के अध्यापक अपने धार्मिक संस्कारों के कारण अपेक्षित
परिणाम नहीं दे सकेंगे| अपने बद्धमूल अहंकार के चलते वे उन विद्यार्थियों में हीन
भाव भी भरेंगे|

     ‘ब्रह्मवंती खेती’ संत चिंतन की परंपरा में
लिखी गई कविता है| संतों ने अन्न को ब्रह्म कहा था और कृषिकार्य को सम्मान की
निगाह से देखा था| संत रैदास ने उस समाज का सपना देखा था जहाँ सबको अन्न मिले|
कबीर ने अन्न को प्राथमिकता दी थी और भगवान से मिलने के लिए अन्न का आश्रय
अपरिहार्य बताया था- ‘अन्नै बिना न होय सुकाल | तजियै अन्न न मिलै गुपाल|’ संत
गरीबदास ने अन्नदेव की दो आरतियाँ लिखी थीं और उसे पोथी-ज्ञान से बढ़कर माना था-
“पोथी-पत्रा विद्यादान | अन्न पुरुष बिना कैसा ध्यान|” संत रज्जब अली ने तो किसान
को सर्वश्रेष्ठ साबित करते हुए प्रकृति के सभी प्रमुख तत्त्वों को कृषि मजदूर के
रूप में देखा था- “पाँचों तत्व मयंक सों, अन्नहि काज मजूर| रज्जब सो दालिद्र में,
आवै क्यों सु हजूर||”

     फूलों पर लिखी कविताओं में रचनाकार सावित्रीबाई के वय की गहरी छाप है|
एक उल्लसित चित्त ही सौंदर्य-संभार को इस तरह देख सकता है, सराह सकता है| निसर्ग
के प्रति सावित्री की यह नव्य दृष्टि उन्हें संत परंपरा से अलग करती है| सावित्रीबाई
अपने प्रिय फूलों को उनके नाम के साथ अपनी कविता का विषय बनाती हैं- ‘रूप बिसेष
नाम बिनु जानें| करतल गत न परहिं पहिचानें||’ नाम स्मृति-कोष को उद्बुद्ध करता है|
चित्त में संचित प्रतिबिम्ब से उस प्रत्यक्ष-गोचर बिम्ब को सम्बद्ध कर देता है| तब,
पुष्प-विशेष से जुड़ी तमाम छवियाँ उस अनुभव-क्षण को अगाध-विराट बना जाती हैं| इस
तरह ‘स्व’-संभूत सौंदर्यानुभव समष्टि की थाती बन जाता है| चम्पा नामक फूल पर लिखते
हुए रचनाकार ने पहले उसके रंग पर निगाह डाली है, फिर ढंग पर और अंततः बाह्य से
आंतरिक गुणों की तरफ आती हुई यह निगाह सुवास-सुगंधि तक पहुँची है| कविता जिस चम्पा
पर केंद्रित है उसका रंग पीला है| इसकी कांति सोने जैसी, वर्ण हल्दी का और आभा
वासंती है| वर्ण और गंध इसे ऐन्द्रिक बनाते हैं, कवियों के आकर्षण का कारण-

“जिस तरह रति के संग

 मदन क्रीड़ा करता है

 ठीक उसी भाँति यह

 कवियों के

 मन को ललचाता|”

 चम्पा के स्थूल और सूक्ष्म वर्णन से आगे बढ़कर
कविता उस रहस्यमयता से संकेत के साथ पूरी होती है जो उसके असमाप्य आकर्षण के मूल
में है-

“गूढपणे तो

 मनात शिरूनी

 काव्य कराया

 उन्मुख करतो||”

नयन, नासिका और रसिक
जनों को तृप्त करता चम्पा का फूल अंततः मुरझा जाता है (“नेत्र नासिका/ रसिक मनाला/
तृप्त करूनी/ मरून पडतो||”)| मगर, ऐसे गूढ़ार्थी पुष्प को कविता में लाकर उसकी
स्मृति अक्षुण्ण कर दी गई है- ‘फूल मरै पर मरै न बासू|’ ‘पिवळा चाफा’ या पीला
चम्पा नामक यह कविता अल्प प्रचलित ‘अक्षर छंद’ में है| ‘जाईचे फूल’ या चमेली के
फूल शीर्षक कविता का छंद भी यही है|  इस
छंद के प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते हैं| पांचवें और छठे वर्ण पर यति होती है| ‘चमेली
के फूल’ कविता में सावित्रीबाई पुष्प से पारस्परिकता कायम करती हैं- “जब-जब मैं
देखती हूँ/ चमेली के फूलों को/ तब-तब वे फूल मुझे निहारते हैं|” सफ़ेद रंग और
मनोहारी सुगंध वाले उमंग भरे पाँच पंखुड़ी के ये फूल ‘मीठी हँसी’ हँसकर, ‘लज्जा भरी
नज़र’ से देखने वाली को निहारते हैं| सिर्फ निहारते ही नहीं, ये रचनाकार को
‘आपबीती’ भी सुनाते हैं| उनकी आपबीती में स्वार्थी-लालची लोगों के कृत्य उभरते
हैं-

 “रीत जगाची

 कार्य झाल्यावर

 फेकुन देई

 मजला हुंगुन||”

–‘जग की रीत/ कार्य
हो गया/ फेंक दिया तब/ मुझे धूल में|’ कहने की जरूरत नहीं कि सावित्रीबाई की
कविताओं की प्रारंभिक या प्रमुख श्रोता/पाठिका उनकी सखियाँ और शिष्याएँ रही
होंगीं| अन्योक्ति की तरह ऐसी कविताएँ उन्हें प्रबोधन भी देती होंगी| ‘जाईची कली’
(जूही की कलियाँ) रात में खिलकर सुगंध बिखेरती हैं| ‘यौवन से ओतप्रोत’ इन कलियों
का जीवन क्षणिक होता है- “नष्ट होऊनी जाय अखेरी/ अशीच मानव कळी जाईची||” –‘नष्ट हो
जाती वह आखिर/ इसी तरह मनुष्य भी है, जैसे जूही की कलियाँ|’ कबीरादि संत मनुष्य की
नश्वरता दर्शाने के लिए ऐसे प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं| सावित्रीबाई उनसे इस
अर्थ में भिन्न हैं कि वे जीवन की सार्थकता का गायन करती हैं| क्षणिक होने से जीवन
निरर्थक नहीं होता| ‘गुलाब का फूल’ कविता में सावित्रीबाई ने ‘कनेर के फूल’ से
इसकी तुलना की है| “रूप-रंग दोनों का एक सा” है लेकिन कनेर का फूल जंगली है| वह आम
आदमी जैसा है जबकि गुलाब ‘राजकुमार’ जैसा| तुलना के बाद नतीजे पर पहुँचती रचनाकार
स्वयं को स्थूल उपयोगितावादी समझ से मुक्त कर लेती है| ‘मन को हरने की पात्रता
गुलाब में’ है| इंसान भी गुलाब के फूल की तरह है-

 “तशी दोन्ही फूले

 असती वेगळी

 योग्यता आगळी

 गुलाबाची||

गुलाब सारखा

 मानव हा प्राणी

 सावित्रीची वाणी

 ध्यानी आणा||”

सावित्रीबाई अपनी इस
बात पर पाठकों का तवज्जो चाहती हैं| ‘कल्चर’ और ‘नेचर’ में वे प्रथम को वरीयता
देती प्रतीत होती हैं| सावित्रीबाई की कविताओं में तितलियों की एकाधिक बार आवृत्ति
हुई है| फूलों पर कविता लिखने वाली रचनाकार तितलियों पर ध्यान दे, यह स्वाभाविक
है| ‘तितली और फूलों की कलियाँ’ में तितलियों की ख़ूबसूरती के वर्णन से कविता शुरू
होती है| चमकदार, सतरंगी, बातूनी हँसी, रेशमी पंख और मनोहर रूप वाली तितलियों को
“…देख-देख मैं खो गयी/ बिसर गयी अपने आप को” | इन तितलियों को कलियों ने आतुर
होकर अपने पास बुलाया| बेसब्री से उनकी राह देखी| तितलियाँ आईं| फूलों का रस पिया|
फूल मुरझाए तो तितलियाँ कहीं और चलती बनीं|

     जिस दिन गुलामी का इतिहास लिखा जाना शुरू
होता है उस दिन गुलामी इतिहास बन जाती है| ‘बावन्नकशी सुबोधरत्नाकर’ संग्रह के
‘उपोद्घात’ की अंतिम पंक्ति है- “कुळाची कथा गीत ग्रंथी लिही मी/ गुलामी जनाचा
इतिहास नामी||” ‘-अपने गीतों में/ शूद्रों की गुलामी का इतिहास लिख रही हूँ|” अगले
खंडों में वे ईरानी मूल के वर्णवादियों/ आर्यों द्वारा छल-कपट से मूल निवासियों की
पराजय, पेशवा राज्य में शूद्रों और अतिशूद्रों का दमन, (1818 ई. में पेशवाई का
अंत) अंगरेजी राज की प्रतिष्ठा, अत्याचारी समाज व्यवस्था का पतनोन्मुख होना,
ज्योतिबा फुले का प्रादुर्भाव, समाज परिवर्तन हेतु उनका आंदोलन, उस आंदोलन के असर
का वर्णन करती हैं| इस संग्रह के प्रारंभ में सावित्रीबाई बताती हैं कि उनकी यह
रचना ‘भुजंग प्रयात’ छंद में है| भुजंग प्रयात चार चरणों वाला समवृत्त छंद है
जिसके प्रत्येक चरण में 12 अक्षर होते हैं| संस्कृत मूल से आया यह छंद अपनी सरलता,
प्रवाहमयता और शब्द मैत्री के लिए जाना जाता है| इसके प्रत्येक चरण में चार यगण
होते हैं| एक यगण में लघु-गुरु-गुरु (ISS) क्रम होता है| हिंदी अनुवाद में इस छंद
का निर्वाह नहीं हो पाया है| इस छंद की गतिमयता के आस्वाद के लिए एक उदाहरण
प्रस्तुत है-

रची काव्य सोपे
भुजंगप्रयाते

मनी वृत्त आखून गाणे
लिहीते

भ्रतारास अर्पी बहू
आदराने

नसे ते इहीहो परी
चिंतनाने||

‘-सहज काव्य रचना
करती हूँ/ भुजंग प्रयात छंद में/ मन के भीतर रचती हूँ पंक्तियाँ/ फिर उतारती हूँ
कागज पर गीत/ जीवन साथी जोतिबा को/ वो सारे गीत अर्पण करती हूँ/ आदर के साथ/ अब वे
यहाँ नहीं हैं इस जगत में/ किंतु हमेशा रहते हैं मेरे चिंतन में||”

     व्यवस्था परिवर्तन किए बिना शूद्रों,
स्त्रियों और दलितों की जिंदगी में बदलाव नहीं आएगा| सावित्रीबाई उन सभी उपायों का
निर्देश करती हैं जिनसे परिवर्तन संभव होना है| ऐसे उपायों में शिक्षा सर्वोपरि
है| उनकी कई कविताओं में शिक्षा की जरूरत रेखांकित की गई है| अपनी एक कविता में वे
आह्वान करती हैं कि जोतिबा दलितों में ज्ञान प्राप्ति की लालसा भर दें| ‘किसान का
कोड़ा’ ग्रंथ के ‘उपोद्घात’ में जोतिबा ने विद्या-अविद्या के परिणामों पर इस तरह
विचार किया है-

 “विद्या बिना मति गयी

 मति गयी तो नीति गयी

 नीति गयी तब गति न रही

 गति न रही तो वित्त गया

 वित्त बिना शूद्र धँसे-धँसाये

 इतने अनर्थ अकेली अविद्या ने ढाये||”

 ‘नवस’ (‘मन्नत’) शीर्षक कविता में सावित्रीबाई
ने अंधविश्वासों में जकड़ी जनता को देखकर दुःख व्यक्त किया है और इससे मुक्ति के
लिए विवेकसंपन्न होने की आवश्यकता बतायी है-

“धोंडे मुले देती|
नवसा पावती|

लग्न का करती| नारी
नर||

सावित्री वदते|
करूनि विचार|

जीवन साकार| करूनि
ध्या||”

 ‘-यदि पत्थर पूजने से होते बच्चे/ तो फिर नर
नारी/ नाहक शादी क्यों रचाते?/ सावित्री कहे/ विचार करो/ जीवन सार्थक करो/ विवेक
संपन्न होकर|’ | ‘तयास मानव म्हणावे का?’  (उसे
कैसे कहें इंसान?) कविता में वे पुनः यही मुद्दा उठाती हैं- “ज्योतिष, पँचांग,
हस्तरेखा में पड़े मूर्ख/ स्वर्ग-नरक की कल्पना में डूबे/ पशु जीवन में भी/ ऐसे
भ्रम के लिए कोई स्थान नहीं/ उसे कैसे कहें इंसान?” वे यह भी कहती हैं जिसे गुलामी
में होने का अहसास न हो, आजादी की कीमत न पहचानता हो, इंसानियत की कोई समझ न हो
उसे भला इंसान कैसे कहें-

“गुलामगिरीचे दुःख
नाही

जराही त्यास जाणवत
नाही

माणुसकीही समजत नाही

तयास मानव म्हणावे
का?”

 ध्यान दीजिए सावित्रीबाई की ये चिंताएँ 1850 के
आस-पास व्यक्त हो रही हैं| हिंदी कविता में इस समय भक्ति और रीति की प्रवृत्तियाँ
ही प्रबल हैं| हिंदी नवजागरण के पुरोधा भारतेन्दु हरिश्चंद्र का जन्म ही 1850 में
होता है! इस युग में सावित्रीबाई उक्त कविता में शिक्षा के महत्त्व का प्रतिपादन
करते हुए लिखती हैं-

 “ज्ञान नहीं, विद्या नहीं

 पढ़-लिखकर शिक्षित होने की मंशा नहीं

 बुद्धि होकर भी उसे व्यर्थ गंवाएँ

 उसे कैसे कहें इंसान?”

‘स्वागत’ कविता में
वे उन बच्चों और उनके अभिभावकों का स्वागत करती हैं जो शिक्षा हेतु स्कूल पहुँचे
हैं| ‘अज्ञान’, ‘शिक्षा के लिए जाग्रत हो जाओ’, ‘श्रेष्ठ धन’ आदि कविताओं में वे
मुक्ति के इसी मार्ग पर प्रकाश डालती हैं| अंग्रेजी भाषा के महत्त्व का गान
उन्होंने अपनी कुछ कविताओं में इसी मकसद से किया है-

“अंग्रेजी पढ़कर
जातिभेद की

 दीवारें तोड़ डालो

 फेंक दो भट-ब्राह्मणों के

 षड्यंत्री शास्त्र-पुराणों को|”

 ‘शूद्रों के दुःख’ कविता में उनका निर्भ्रांत
कथन है- “शूद्रों के उद्धार का है/ एक मात्र रास्ता/ वह है शिक्षा का रास्ता|”
किंचित नाटकीयता लिए प्रयोगशील कविता ‘सामुदायिक संवाद पद्य’ (‘समूह-संवाद की
कविता’) में पाँच-पाँच बालिकाओं के चार समूह निर्दिष्ट हैं| ये समूह आपस में संवाद
करते हैं| पहले समूह की लड़कियाँ शिक्षा का महत्त्व जानती हैं| वे सभी से स्कूल
चलने को कहती हैं| दूसरे समूह की बालिकाएँ स्कूल जाने से खेलना बेहतर समझती हैं-
‘अरे, क्या धरा है पाठशाला में?’| तीसरे समूह की लड़कियों के लिए घरेलू काम करने
जरूरी हैं- “तुमचं बोलणं पटत नाही घरची काम करू चला” ‘-तुम्हारी बात मानने लायक
नहीं| चलो घर का काम करें|’ चौथा समूह सलाह देता है कि इन सभी विकल्पों में क्या
सही है यह जानने के लिए ‘आई’ (माँ) से पूछते हैं| ‘माँ’ का जवाब है- “अभिमानाने
जगण्यासाठी शिकून ध्या जा शाळेला”

मनुष्याचा खरा
दागिना शिक्षण आहे ध्या चला

                   जा शाळेला जा शाळेला

काम पहिलं शिकायच
आहे, दुसरं काम खेळ खेळा

जमेल तेव्हा झाडणं
पुसणं हात लावा घरकामाला

                      जा आधि जा शाळेला”

 

 ‘-संसार में स्वाभिमान से जीने के लिए/ शिक्षा
प्राप्त करो/ मनुष्यों का सच्चा गहना है शिक्षा/ विद्यालय जाओ/ पहला काम है पढ़ाई,
दूसरा काम खेल-कूद/ पढ़ाई से फुर्सत मिले तभी करो घर की साफ़-सफाई/ चलो, अब पाठशाला
जाओ|’ उस दौर में बालिकाओं के लिए यह वरीयता क्रम सुखद आश्चर्य से भर देता है
! इस प्रबोधन के बाद लड़कियों का यह समूह कोरस में
कहता है-

“अज्ञानाची दारिद्रयाची
गुलामगिरीही तोडू चला

युगयुगाचे जीवन आपले
फेकून देऊ चला चला|”

 ‘-अज्ञानता और दरिद्रता की गुलामगिरी चलो तोड़
डालें/ युगों का यह (दासता भरा) जीवन चलो फेंक आएँ|’ गुलामी का अहसास कराती,
मुक्ति की राह बताती, लड़कियों को प्रबोधन देती ऐसी माँ उस समय तक विश्व साहित्य
में भी दुर्लभ थी| ‘माँ’ का क्रांतिकारी चरित्र पहली बार गोर्की के इसी शीर्षक से
प्रकाशित उपन्यास ने प्रस्तुत किया| सावित्रीबाई की उक्त कविता के पचास वर्ष बाद
1906 में आए ‘मदर’ उपन्यास की माँ निलोवना अपने बेटे पावेल और उसके दोस्तों के
कारण धीरे-धीरे बदलती है| ‘सामुदायिक संवाद पद्य’ की आई (माँ) नई पीढ़ी की लड़कियों
को ज्ञान, सचेतनता, स्वतंत्रता और स्वाभिमान की ओर अग्रसर करती है| ‘मदर’ उपन्यास
का यह कथन जैसे सावित्रीबाई की कविता की अनुगूँज है- “हज़ारों लोग ऐसे हैं जो अगर
चाहें तो बेहतर जिंदगी बिता सकते हैं लेकिन वे जंगलियों जैसी जिंदगी बिताते रहते
हैं और उसी में मगन रहते हैं|”

     आज हम सावित्रीबाई को कैसे पढ़ें? उन्हें किस
तरह प्रस्तुत करें? प्रश्न गंभीर है और संवेदनशील भी| अक्सर देखने में आता है कि
उनके व्यक्तित्व और लेखन के जो पक्ष ‘असुविधाजनक’ लगते हैं उन पर चुप्पी साध ली
जाती है| बहुधा उन्हें इस तरह पेश किया जाता है जैसे वे आज के अस्मितावादी एजेंडे
के अनुरूप लिख रही थीं, अपनी प्राथमिकताएं तय कर रही थीं! इस तरह की प्रस्तुति में
ऐतिहासिकता की क्षति होती ही है, उस विकास-प्रक्रिया को समझने में भी बाधा आती है
जिससे गुजरकर मुक्ति आंदोलन समकाल तक पहुँचा है| उक्त विवेचन में हमने देखा कि
सावित्रीबाई पारंपरिक छंदों में अपनी कविताएँ रचती हैं| उनके द्वारा प्रयुक्त काव्यवृत्तों/छंदों
की संख्या आठ है| वे ‘ईशस्तवन’, ‘शिव प्रार्थना’ और ‘शिवस्तोत्र’ रचती हैं| ‘ईशस्तवन’
में वे शंकर से ज्ञानार्थियों को विद्या देने तथा दीनता दूर करने की प्रार्थना
करती हैं- “विद्या देई ज्ञान इच्छितो/ दैन्यासुर संहारा/ श्रीधरा||” ‘शिव प्रार्थना’
में वे पुनः सबकी अज्ञानता दूर करने की प्रार्थना करती हैं- “अज्ञान नष्ट कारी, वर
सर्वा लाभो|| प्रार्थना ही सावित्रीची||” ‘शिवस्त्रोत’ में उनकी कामना है कि शंभु
उनकी जिह्वा पर विराजें जिससे वे यशःपूत काव्य रच सकें- “त्या शंभूला पुजुनिया वर
मागते मी/ जिह्वेवरी बसूनि तू रचि काव्य नामी|” भगवान शिव के प्रति अपनी श्रद्धा
की अभिव्यक्ति उन्होंने अपने काव्यसंग्रह के मुखपृष्ठ के चुनाव में भी की थी|
‘काव्यफुले’ के कवर पेज पर शिव-पार्वती का चित्र छपा था| शिव के प्रति उनके
श्रद्धा-भाव से ज्योतिबा फुले रुष्ट हुए हों, ऐसा कोई साक्ष्य या संकेत मुझे नहीं
मिला है| ज्योतिबा की हिंदू देवी-देवताओं में कोई आस्था नहीं थी फिर भी उन्होंने
अपनी इच्छा सावित्रीबाई पर नहीं थोपी| वे सामाजिक जनतंत्र के लिए संघर्ष कर रहे
थे| वे परिवार में भी जनतांत्रिक माहौल चाहते थे| 1889 में लिखी अपनी ‘सार्वजनिक
सत्यधर्म’ पुस्तक में उन्होंने ऐसे परिवार की कामना की है जिसके सभी सदस्य अलग-अलग
धर्मों को मानने वाले हों तथापि वे आपस में ‘प्रेम और अपनापे’ से रहते हों|     

     सावित्रीबाई
के सरोकारों की व्यापकता का ज्ञान उनके भाषणों से भी होता है| उनके पाँच भाषणों की
एक पुस्तक 1892 में शास्त्री महाघट, वत्सल प्रेस, बड़ोदा से छपी थी| सावित्री ने
स्वयं ज्योतिबा के भाषणों को संकलित, संपादित कर शिला प्रकाशन, पुणे से 1856 में
छपवाया था| सावित्रीबाई ने जिन विषयों पर भाषण दिया था उनके शीर्षक थे- ‘उद्योग’,
‘विद्यादान’, ‘सदाचरण’, ‘व्यसन’ और ‘कर्ज’| अपने व्याख्यान में वे संस्कृत के
श्लोक भी उद्धृत करती हैं| उनके द्वारा उद्धृत श्लोक विद्या और वित्त के महत्व पर
प्रकाश डालता है| कुलीनता का दारोमदार इसी पर टिका होता है| अकुलीन भी अगर ज्ञान
प्राप्त कर लें तो वे पूजनीय हो जाते हैं- ‘विद्यावित्तविहीनेन किंकुलीनेन
दोहिनाम्| अकुलोनोपि यो विद्वान् दैवतैरपि पूज्यते|’ 20 अप्रैल, 1877 ओतूर जुन्नर
से जोतिबा को लिखे पत्र में उन्होंने 1876 में आए अकाल की विभीषिका का वर्णन किया
है| सत्यशोधक मंडल द्वारा किए जा रहे राहत कार्यों का नेतृत्व करने सावित्रीबाई
वहाँ गई थीं| अपने पत्र में उन्होंने वहाँ सक्रिय सभी सत्यशोधक कार्यकर्ताओं का
नामोल्लेख किया है| उल्लिखित नामों में रा.ब. कृष्णाजी पंत और लक्ष्मण शास्त्री भी
हैं| इनके बारे में सावित्रीबाई ने लिखा है- “रा.ब. कृष्णाजी पंत लक्ष्मणशास्त्री
हे आपणास विश्रुत आहेत| त्यांनी माझ्या समवेत दुष्काळी गावात जाऊन दुष्काळाने
हैराण झालेल्या लोकांना द्रव्यरुपाने मदत केली|” ‘-राय बहादुर कृष्णाजी पंत,
लक्ष्मण शास्त्री आपको (जोतिबा को) और आपके कार्यों को जानते हैं| इन लोगों ने
मेरे साथ अकाल पीड़ित गाँवों का दौरा कर, अकाल पीड़ित लोगों को पैसे देकर मदद की
है|’ सावित्रीबाई व्यक्ति और व्यवस्था का अंतर भलीभांति समझती हैं| 10 अक्टूबर
1856 को लिखे पत्र में वे अपने भाई की भ्रष्टबुद्धि, अल्पबुद्धि या द्वेषबुद्धि का
कारण उसका भट लोगों (पुरोहितों) की शिक्षा के प्रभाव में आना बताती हैं- “भाऊ तुझी
बुद्धी कोती असून भट लोकांच्या शिकवणीने दुर्बल झाली आहे|”

   मराठी के प्रथम आधुनिक कवि केशवसुत माने जाते
हैं| केशवसुत का मूल नाम कृष्णाजी केशव दामले था| उनका जीवनकाल 1866-1905 है| कुल
उनतालीस वर्ष की अवस्था में उनकी मृत्यु प्लेग से हुई थी| वे विचारों में
प्रगतिशील थे| जाति-वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध| जातितंत्र को देश की परतंत्रता का
हेतु मानने वाले| उन्होंने अस्पृश्यता, बाल विवाह के विरुद्ध लिखा| उनकी कुल 135 कविताएँ
उपलब्ध हैं| ये 1885 से 1905 के मध्य लिखी गई हैं| केशवसुत के जीवित रहते उनका कोई
संग्रह नहीं छपा| हरिनारायण आप्टे ने उनकी कविताओं को 1916 में पहली बार संग्रह
रूप में प्रकाशित कराया| केशवसुत के जन्म से पहले ही सावित्रीबाई का पहला संग्रह
छप चुका था| जाहिर है सावित्रीबाई को ही मराठी का पहला आधुनिक कवि स्वीकारा जाना
चाहिए| प्रथम कवि के प्रश्न पर विचार करते हुए साहित्यकार डॉ. अशोक चोपडे ने
महात्मा फुले को ‘आधुनिक मराठी कविता का जनक’ कहा है| ध्यातव्य है कि जोतिबा की
किताब सावित्रीबाई के बाद ही प्रकाशित हुई थी| 1855 में जोतिबा का लिखा नाटक
‘तृतीय रत्न’ छपा था| यह उनकी पहली प्रकाशित कृति थी| इस तथ्य के आलोक में
सावित्री को ही पहला आधुनिक मराठी साहित्यकार/कवि मानना चाहिए| वे सिर्फ मराठी
नहीं, आधुनिक भारतीय कविता की प्रथम हस्ताक्षर मानी जा सकती हैं| उन्होंने अपनी
कविताओं में जिस तरह मनुष्य और प्रकृति के संबंध को रचा उससे उन्हें भारतीय कविता
का आरंभिक स्वच्छंदतावादी रचनाकार माना जा सकता है|
इस स्थापना के औचित्य पर अन्यत्र विस्तार से
विचार किया जाना चाहिए| कविता में स्वाभाविक स्वच्छंदता के प्रश्न पर विचार करते
हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा था “यह भावधारा अपने साथ हमारे चिरपरिचित
पशुपक्षियों, पेड़पौधों, जंगल मैदानों आदि को भी समेटे चलती है|” इस संबंध में
उन्होंने यह भी लिखा कि स्वच्छंद भावधारा की अभिव्यंजन प्रणालियाँ वे होती हैं
जिनमें जनता अपने को सहजता से व्यक्त करती आ रही होती है| सावित्रीबाई ने जिन
पौधों, फूलों और प्राणियों पर लिखा वे जनता के प्रगाढ़ परिचय के दायरे में आते हैं|
सच्चे स्वच्छंद काव्यमार्ग की रूपरेखा स्पष्ट करते हुए आ. शुक्ल ने लिखा है- “जब
पंडितों की काव्यधारा इस स्वाभाविक भावधारा से विच्छिन्न पड़कर रूढ़ हो जाती है तब
वह कृत्रिम होने लगती है और उसकी शक्ति भी क्षीण होने लगती है| ऐसी परिस्थिति में
इसी भावधारा की ओर दृष्टि ले जाने की आवश्यकता होती है| दृष्टि ले जाने का
अभिप्राय है उस उस स्वाभाविक भावधारा के ढलाव की नाना अंतर्भूमियों को परख कर
शिष्ट काव्य के स्वरूप का पुनर्विधान करना| यह पुनर्विधान सामंजस्य के रूप में हो,
अंधप्रतिक्रिया के रूप में नहीं, जो विपरीतता की हद तक जा पहुँचती है| इस प्रकार
के परिवर्तन को ही अनुभूति की सच्ची नैसर्गिक स्वच्छंदता (ट्रू रोमांटिसिज्म) कहना
चाहिए, क्योंकि वह मूल प्राकृतिक आधार पर होता है|” (‘हिंदी साहित्य का इतिहास’,
ना. प्र. सभा, वाराणसी, सं. २०४९ वि., पृ. ३२६-२७)  आ. शुक्ल रहस्यात्मकता, दार्शनिकता, कलात्मकता
तथा व्यक्तिगत स्वातंत्र्यभावना के प्रदर्शन को ‘सच्ची नैसर्गिक स्वच्छंदता’ के
लिए बाधक मानते हैं| इंग्लैंड के सच्चे स्वच्छंदतावादी कवियों में वे काउपर,
रॉबर्ट बर्न्स और वाल्टर स्कॉट का नाम लेते हैं| काउपर ने कविता को पांडित्य की
विदेशी रूढ़ियों से मुक्त किया, किसानी झोपड़े में रहने वाले बर्न्स ने इस कविता को
जनता के हृदय में संचरण करने लायक बनाया अर्थात् ‘देश के परंपरागत प्रचलित गीतों
की मार्मिकता परखकर देशभाषा में रचनाएँ कीं’ और वाल्टर स्कॉट ने ‘देश की
अंतर्व्यापिनी भावधारा से शक्ति लेकर साहित्य को अनुप्राणित किया|’ ‘ट्रू
रोमांटिसिज्म’ की उक्त कसौटियों पर सावित्रीबाई का काव्यकर्म खरा उतरता है| उनमें
वैयक्तिकता की भावना अवश्य ही मजबूत है लेकिन वह जन-स्वातंत्र्य की चिंता से बढ़कर
नहीं है|

     सावित्रीबाई भारतीय स्त्रीवाद की भी पहली
आवाज हैं| स्त्रीवादी होने का आशय है उस शोषणतंत्र को पहचानना जो स्त्री समुदाय को
कमतर, हीनतर बनाए रखता है| स्त्रीवादी वे हैं जो थोपी गई वर्जनाओं को मनसा-वाचा-कर्मणा
निरस्त करती हैं| जिन दिनों अपने प्रेम का इजहार करना वर्जित था, सावित्रीबाई ने
खुलकर जोतिबा के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त किया| जब पति का नाम लेना निषिद्ध (टैबू)
था तब उन्होंने जोतिबा को नाम से ही संबोधित किया| जोतिबा निर्गुण ब्रह्म में
विश्वास करते थे| सावित्री ने अपनी अलग राह बनायी| उन्होंने शिव के प्रति अपनी
आस्था रखी| निर्गुण ब्रह्म की सारी अच्छाइयों के साथ यह दिक्कत भी है कि वहाँ
स्त्री की कोई जगह नहीं जबकि शिव के साथ या समकक्ष पार्वती की सत्ता हुआ करती है|
भारत के इतिहास में ऐसा उदाहरण शायद ही मिले जब किसी पत्नी ने अपने पति को
मुखाग्नि दी हो| जोतिबा फुले का अंतिम संस्कार सावित्रीबाई ने ही किया था| अब तक
वे सत्यशोधक समाज की महिला शाखा की प्रमुख थीं| जोतिबा के स्मृतिशेष होने के बाद
उन्होंने पूरे सत्यशोधक समाज का नेतृत्व किया| अपने पति के प्रति सारे सम्मान के
बावजूद उन्होंने हमेशा बराबरी के स्तर पर ही संवाद किया| मानो इस बात को प्रमाणित
करने के लिए ही उन्होंने ‘काव्यफुले’ संग्रह की अंतिम कविता (सावित्री-जोतिबा
संवाद) लिखी थी! पुरुषवादियों को उन्होंने बिना चूके मुंहतोड़ जवाब दिया| स्कूल से
पढ़ाकर लौटते वक्त एक बार एक दबंग ने उनका रास्ता रोक लिया| उसने धमकाया कि अगर वे
महारों-मातंगों को पढ़ाना बंद नहीं करेंगी तो उनका बहुत बुरा अंजाम होगा|
सावित्रीबाई न दबीं न झुकीं| तमाम तमाशबीनों के समक्ष उन्होंने उस गुंडे को इतना
तगड़ा थप्पड़ लगाया कि उससे भागते न बना| यह घटना पूना में बड़ी तेजी से चर्चित हो
गई| इसके बाद किसी अन्य व्यक्ति ने उनका रास्ता रोकने की हिम्मत नहीं की| ‘फुलपाखरू
व फुलाची कळी’ (तितली और फूल की कली) में उन्होंने स्त्री के साथ होने वाली
दगाबाजी और शोषण का चित्र खींचा है| इस कविता में फुलपाखरू पुरुष वर्ग का प्रतीक
है और कली स्त्री वर्ग की| फुलपाखरू को हिंदी में तितली कहा जाता है| तितली
स्त्रीलिंगी शब्द है| ऐसे में भ्रम से बचने के लिए या तो मूल कविता का फुलपाखरू
शब्द व्यवहृत हो या फिर उसका संस्कृत प्रतिशब्द ‘चित्रपतंग’| भावावेश में कली
फुलपाखरू को आमंत्रित करती है, उसे अपना सब कुछ सौंप देती है| बदले में फुलपाखरू-

“रूप तियेचे  करी विच्छिन्न

नकोसे केले   तिजला त्याने

शोषून काढ़ी  मध तियेचा

चिपाड केले  तिला तयाने ||”

‘बिगाड़ डाली उसकी
काया/ उजाड़ डाला आँधी बनकर/ सुखा डाला शहद खींचकर/ प्राण सोखकर बर्बाद करके/ चला
गया वह उसे त्याग कर|” कली की यह परिणति दिखाकर कवयित्री लिखती है कि उसकी बर्बादी
का जिम्मेदार फुलपाखरू कभी उस ओर नहीं लौटा, सपने में भी याद नहीं किया| उसमें
शर्म नाम की कोई चीज़ ही नहीं है- “जावयास त्या 
लाजही नाही|” कोई याद कराए तो वह पूछता है, कौन-सी कली : “कोण कोठली कळी
फुलांची” ? फुलपाखरू की बेवफाई देखकर सावित्री हैरान रह जाती हैं- “पाहुनिया
मी  स्तिमित होई|” अपने मायके नायगाँव से
29 अगस्त 1868 को लिखे पत्र में वे जोतिबा को एक ‘मॉब लिंचिंग’ की सूचना देती हैं|
गाँव की एक महार नवयुवती सारजा का आकर्षण पोथी-पत्रा वाले गणेश के प्रति हो गया| दोनों
के बीच शारीरिक संपर्क से गर्भ भी ठहर गया| यह खबर बाहर आयी और लुच्चे-लफंगों ने
उन दोनों को घेर लिया| पीट-पीट कर उनकी हत्या करने लगे| यह जानकारी मिलते ही
सावित्री भागते हुए वहाँ पहुँचीं और हत्यारी भीड़ को क़ानून का, अंग्रेज सरकार का भय
दिखाकर किसी तरह रोका| पंचायत बैठी| दोनों को गाँव से बहिष्कृत कर दिया गया| यह सब
बताकर पत्र के अंत में सावित्री लिखती हैं कि मैंने उन दोनों को आपकी शरण में भेज
दिया है| उम्मीद है यह सब जानकर आप उनके रहने की कहीं व्यवस्था कर देंगे- “या
उभयतांस तुमचेकडे पाठविले आहे| अधिक दूसरे काय वर्तावे| कळावे ही विज्ञापना|” डॉ.
आंबेडकर ने कहा था कि वे इस लिए जागते रहते हैं क्योंकि उनका समाज सोया हुआ है| सावित्रीबाई
ने बिना कहे ही यह बात बहुत पहले जाहिर कर दी थी| शूद्रातिशूद्र के जागरण हेतु
लिखी गई किताब ‘बावन्नकशी सुबोध रत्नाकर’ के समापन के साथ सावित्रीबाई ने समय भी
दर्ज कर दिया था- “मिती शुक्ल पक्ष १५ शके १८१३ रात्री २ बाजून २० मिनिटानी ही
पोथी लिहून पूरी केली असे||” रात दो बजकर बीस मिनट पर ग्रंथ लेखन का कार्य पूर्ण करने
का अर्थ है कि लेखिका की प्रतिबद्धता, सरोकार और प्राथमिकता उसके निजी सुख, नींद,
आराम से बढ़कर है| सावित्रीबाई के आरंभिक जीवनीकारों ने उचित ही इस तेजोदीप्त
व्यक्तित्व को ऐसे विशेषण दिए हैं| प्रथम जीवनीकार (1980) डॉ. मा.गो. माळी ने
उन्हें ‘क्रांतिज्योति’ और डॉ. के. पी. देशपाण्डे (1982) ने उन्हें ‘अग्निफुले’
कहा है|

   उनकी मृत्यु के सवा सौ बरस बीत जाने के बाद उनकी
प्रासंगिकता कम होने की बजाए बढ़ी है| वे भारत के दलित स्त्री आंदोलन की नींव रखने
वाली पुरस्कर्ता-प्रस्तावक रचनाकार हैं| जाति, जेंडर और वर्गीय शोषण के विरुद्ध
संघर्ष में सावित्रीबाई फुले की कविताएँ दीपस्तंभ की भांति प्रतिबद्ध
आंदोलनकारियों का मार्गदर्शन करती रहेंगी|

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संदर्भ और आभार

‘सावित्रीबाई फुले
की कविताएँ’ (2015), संपादन- अनिता भारती, अनुवाद – शेखर पवार, फ़ारूक शाह, स्वराज
प्रकाशन, नई दिल्ली,

‘सावित्रीबाई फुले
रचना समग्र’, (2017), संपादक- रजनी तिलक, अनुवादक- शेखर पवार, द मार्जिनलाइज्ड
पब्लिकेशन, इग्नू रोड, दिल्ली-68.

‘काव्य फुले’ (2012,
अंगरेजी अनुवाद), अनुवादिका- उज्ज्वला म्हात्रे, संपादिका- ललिताधारा, प्रकाशक-
डॉ. आंबेडकर कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स, मुंबई.

‘सावित्रीबाई फुले
समग्र वाङ्मय’ (2018), मुख्य संपादक- प्रा. हरी नरके, संपादक- प्रा. मा. गो. माळी,
महात्मा जोतीराव फुले चरित्र साधने प्रकाशन समिती, महाराष्ट्र शासन, मुंबई, इस
ग्रंथ का प्रथम संस्करण 1988 में छपा था|

‘महात्मा फुले :
साहित्य और विचार’ (1993), संपादक- हरि नरके, महात्मा फुले चरित्र साधने प्रकाशन
समिती, महाराष्ट्र शासन, मुंबई,  

‘किसान का कोड़ा’
(1996), महात्मा जोतीराव फुले, हिंदी अनुवाद- प्रा. वेदकुमार वेदालंकार, महात्मा
जोतीराव फुले चरित्र साधने प्रकाशन समिती, महाराष्ट्र शासन, मुंबई.

‘हिंदी साहित्य का
इतिहास’, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, छब्बीसवाँ
संस्करण, सं. 2049 विक्रमी.

यह लेख शायद ही लिखा
जाता अगर मा.शेखर पवार ने सावित्रीबाई फुले की रचनाओं का हिंदी अनुवाद न किया
होता| उनके प्रति आभार व्यक्त करते हुए मैं यह जरूर कहना चाहूँगा कि अभी तक जो दो
अनुवाद प्रकाशित हुए हैं वे त्रुटिरहित नहीं हैं| इनमें अनुवादकीय और संपादकीय
दिक्कतें नज़र आती हैं| अगर मैं मूल मराठी ग्रंथ अपने सामने न रखता तो इस निबंध में
गलतियों की संख्या बढ़ जाती|

     इस निबंध को लिखने का प्रस्ताव दिया दलित
लेखक संघ (दलेस) के अध्यक्ष मा. हीरालाल राजस्थानी ने| इस निबंध का पहला ड्राफ्ट
दलेस की पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के सावित्रीबाई फुले विशेषांक में छपा है| दूसरा
परिवर्धित ड्राफ्ट ‘कथादेश’ पत्रिका के मई 2019 अंक, मेरे ‘दलित प्रश्न’ स्तंभ
में| मैं इन दोनों पत्रिकाओं के संपादकों को धन्यवाद देता हूँ| मराठी ग्रंथ उपलब्ध
कराने के लिए अपने अग्रज प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता
हूँ| मराठी भाषा के विद्वानों और अपने शुभचिंतकों मा. अरविंद सुरवाड़े, प्रो. अनिल
सपकाल, राहुल कोसंबी, सूर्यनारायण रणसुभे, शिवदत्त वावलकर से निबंध तैयार करते समय
पूछताछ करता रहा हूँ| अगर इस निबंध में कुछ सार्थक है तो इसका श्रेय इन्हें है और
गलतियों की जिम्मेदारी मेरी है|

देशबंधु महाविद्यालय ने मुझे एक वर्ष का सबाटिकल अवकाश प्रदान करके
अध्ययन और लेखन का रास्ता कुछ और आसान बनाया है| मैं अपनी संस्था और इसके
प्राचार्य के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ|

(चित्र साभार : गूगल) 

Email id- btiwari@db.du.ac.in   

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