‘ सपनों की सार्वजनिकता ‘ – ऋचा जैन की कविताएँ

आना मेनदीयेता, एल लाबेरिंतो दे ला वीदा, १९८२ आर्ट मायामी


हम सब गर्भ से हैं  

वह लड़का भी
वह लड़की भी
वह आदमी, वह बूढ़ा, वह बच्चा
वह औरत, वह बूढ़ी, वह बच्ची
वह ट्रांसजेन्डर, वह गे, वह लेस्बियन,
वह बाँझ

सब
हम सब गर्भ से हैं  

हर समय, आरम्भ से
अपने स्वयं के कोमल, सुकुमार, सुंदर, भव्य जीव के साथ।



   

क़ब्रिस्तान अभयारण्य है

क़ब्रिस्तान अभयारण्य है
सोए हुए लोगों के सपनों का

विचरते हुए वहाँ कभी जब टकरा जाता है

मेरा कोई स्वप्न

वहीं रह रहे उसी प्रजाति के दूसरे स्वप्नों से

तो वह झुंड मेरे सपने को कौतूहल से देखता है

पहचानने की कोशिश में

उनके विस्मय से कहीं अधिक है मेरे सपने का आश्चर्य- अपनी सार्वजनिकता
और बहुलता पर

सब साथ फ़िशपोंड के किनारे पहुँच पानी पीते हैं
एक दो पत्तियाँ चबाते हैं

गुलाबों की ख़ुशबू खींचते हैं

और फिर स्वप्न मेरा अपनी राह निकल आता है 

निश्चित ही ऊर्जावान, संकल्पित, प्रोत्साहित

किंतु निश्चिंत और तटस्थ भी।


प्रिय पुत्री

अगर देखना ही चाहोगी मेरे पदचिन्ह, मेरी बेटी, तो देखना उनमें
ध्यान से
आँखें भी हैं
और अबके ढूँढना मत टेलेस्कोप से किसी ध्रुव तारे को
बल्कि देखना घास पर लेटकर मुक्त आँखों से
जगह फेरते अनाम तारे
और उनकी कम-ज़्यादा होती टिमटिमाहट

अगर देखना ही चाहोगी मेरे पदचिन्ह मेरी बेटी, तो सुनना
ध्यान से
उनमें कान भी हैं 
और अबके छोड़ देना गंतव्य को
और सुनना सारी बातें यायावरी की
 
जो देखना ही चाहोगी मेरे पदचिन्ह तो सूँघना
ध्यान से
कुछ गंध भी होंगीं उनमें
गहरे खींचना और पहचानना
हवा, पानी, हँसी और स्वछंदता   जो देखना ही चाहोगी मेरे पदचिन्ह तो देखना
मत
कि कहाँ तक, किस राह, कितने सुडौल या कितने बड़े
वरन देखना, कहाँ ठिठक हो गए थे खड़े
किन दरवाजों को रहे तकते

वहाँ, बस वहाँ रुक जाना ।
और अबके न करना अनसुना हृदह के भीतरी कमरों से आते उन मद्धम आभासों को
खटखटाना उन दरवाज़ों को
जो देखना ही चाहोगी, मेरी बेटी, मेरे पदचिन्ह
तो देखना, सुनना, सूँघना, समझना
और चिन्हित करना नए
स्वयं के…


जबलपुर, मध्य प्रदेश में जन्म। शासकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय, जबलपुर से विद्युत अभियांत्रिकी में स्नातक। वर्तमान में लंदन में तकनीकी विशेषज्ञा के पद पर कार्यरत। पूर्व में जर्मन भाषा का अध्यापन, वर्तमान में हिन्दी का ऑनलाइन अध्यापन। कविता, बाल साहित्य, संस्मरण, ग़ज़ल विधा में लेखन। काव्य संग्रह ‘जीवन वृत्त, व्यास ऋचाएँ’ भारतीय उच्चायोग लंदन से लक्ष्मीमल सिंघवी अनुदान योजना के तहत सम्मानित एवं भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। आरंभिक जर्मन भाषा के लिए कहानी की किताब ‘श्पास मिट एली उंड एज़ी’ २०१४ में गोयल एंड गोयल से प्रकाशित। हिन्दी एवं अंग्रेज़ी पत्रिकाओं, वेब साइट्स एवं संकलनों में कविताएँ प्रकाशित। कविताओं का अंग्रेज़ी एवं नेपाली में अनुवाद।