एक बंगालन के गोदने में कैद है महाब्रह्माण्ड : जोशना बैनर्जी आडवाणी की कविताएँ

 जोशना बैनर्जी की कविताएँ बांग्ला परिवेश, भाषा और जीवन शैली की कम जानी- समझी गयी दुनिया से हिन्दी जगत का परिचय कराती हैं लेकिन इनकी कविताओं की स्त्री- संवेदनाएँ सिर्फ़ एक बंगालन स्त्री की नहीं हैं। दुनिया की हर स्त्री का उल्लास, राग, विराग, मोह, शृंगार, चपलता, उदासी यहाँ भाषा की सम्पूर्ण लय के साथ उपस्थित है। यहाँ स्त्रियों की हँसी का वैभव झाँकता है तो उनकी पीड़ा का उदास संगीत भी है। ये एक साथ नेह-छोह और फिर विछोह की एक देखी- अनदेखी दुनिया रचती हैं’-   रश्मि भारद्वाज 
   
 
ढाँप दो निशानाथ को 
 
ढाँप दो निशानाथ को
कुहुकिनी से कहो साधे गांधार
देवसरिता कराये हमारा स्नान
घनप्रिया से कहो अभी सो जाये
कह दो
इन सब से ऐसा ही करे
ढूँढों तुहिनकण वाली घास
जहाँ हम बैठ सकें पूरी रात
नीले नारंगी सभी स्वप्नों से कहो पहरा दें
घास के उस तरफ
 
हम बैठेंगे पूरी रात यहाँ
कोई जल में तिनका भी न गिराये हमारे मिलन की घड़ी में
दो संकेत हवाओं को ये सावधान रहें
समझा दो इन्हें
ये बासन घिसने जितना सहज नहीं
ये कठिन है
कोई दो प्रेमी जब मिलें
तो उन्हीं के संकेत का पालन करें पृथ्वी, देव और दिशायें
 
हमारा मन बहलाने केवल चिड़ियाँ, तितली और
वैशाखनंदन आ सकते हैं यहाँ
इनके समान सुंदर मन किसी और का नहीं
आते समय मेरी एक चप्पल गुम गई है
कहो लम्बोष्ठ से ढूँढ के लाये
 
अपनी पुतलियों से आओ ठेल दें सबको
यहाँ रूके हम, कहें हम, लजाऐं हम
भोर में जब हम निकलें यहाँ से
पृथ्वी पूरी पहले जैसी  हो जाये
और भाषा भी।
 
 
***
 
 
 
भात
 
भात पकाकर माँ ने ताँबें के बर्तन में केले के पेड़ के नीचे रख छोड़ा, पिता की आयु स्वर्ग से खींचती रही
भात, उबले आलू और मधु से भिक्षुणी को विदा किया
भात पकाया जब जब पिता ने, बेचे हुए खेतों के किस्से बार बार सुनाये
भात परोसती माँ को पिता पौलमी, यमी, शचि, कामायनी, सुतम्भरा न जाने क्या क्या कहते रहे
चार दानें जो छूट जाते थाली में भात के, दादी चिल्लाती भात का सम्मान इंद्र से भी बड़ा है, एक दाना न बचे थाली में
चावल की बोरियाँ ग्राम से आ जाती थीं वर्ष में
एकाध बार, परंतु उससे काम न चलता
दो बेला भात की जुगत में पिता के देह का रंग भात से उतर कर कोयला होता रहा
भात से उठते धुएँ में ही पढ़ाई की
भात के पानी से त्वचा चमकाई
भात के मांड से ही सूती कुर्ते और साड़ियाँ कड़क होते रहे
शरीर में विटामिन ई, बी और सी बढ़ाया
भात ही पूजा में दुग्गा को चढ़ाया
बचा भात भिक्षुकों को खिलाया
 
सप्ताह में तीन दिन पांता भात बनता
खाते खाते सात योजनाएँ बन जातीं
छः विफल रहती
बासी भात खा खाकर ही पुरनेंदू चैटर्जी ने अपना अल्सर ठीक किया
कोई बहुत बड़ा नाम नहीं ये, हमारे पड़ोसी थे
पत्नी मर चुकी थी, कई दिनों तक नून भात खाया, माटी में पड़े रहे
कोई बीस एक दिन तक हम सब्ज़ी, मछली  देते रहे
भात की चिंता में ही पुनः उठ खड़े हुए
 
कितने भातमयी हैं हम बंगाली
अपने अलावा कुत्तों, बिल्लियों, पक्षियों, चीटियों, मछलियों, तोतों को भी भात ही खिलाते आ रहे हैं
भात न पके जब, वह दिन हमें डरा देता है
क्या ही माँगता है भात हमसें नम जलवायु और थोड़ा सूर्य
पिछले साल करीब ११८.४३ मिलियन टन चावल उगाया गया देश में
देश में भात खाने वालों को मिलता रहे और भात, ऐसा कह कह के पंडित जी फेरा पाते थे गली में
भात ही त्रिदेव का कारक है, समयकाल भात का ही जना है, ऐसा भी कहते थे
 
भात खाते खाते ही जानी अपनों के मन की बात
किसने किससे प्रेम किया, किसने किसे छला, किसने चूम लिया किसे, किसने क्या लिखा, कौन कितना धनेश बना, मूखे भात में किसने पहने सबसे सुंदर वस्त्र, पोखर के समीप प्रेमपत्र किसने किसे दिया
इस सब की खबर भात खाते खाते ही मिली
अन्न, धन, गहने में सबसे बड़ा चरित्र भात ही बना रहा
 
भात मात्र भात न हुआ प्राण हुआ भात हमारा
कोई आता तो भात ही लेकर आता
कोई जाता तो भात ही खाकर जाता
भात पकाने के लिए डिब्बे से चावल निकालते समय माँ तीन चुटकी चावल वापस डाल देती थी डिब्बे में
इससे बरकत होती है, ऐसा मानती थी
 
मछली का काँटा फँसा दाँत में कई बार, भात कभी न फँसा
भात न फँसता न फाँसता
भात तो शीतलता ही देता रहा
भात से ही बने मेरे दाँत, मेरी हड्डी, मेरी देह
भात ने ही मुझे जिलाये रखा
भात पचने पर ही बना रस, रस से रक्त बना, रक्त से ही सब बना
माँ का गर्भ, पिता का वीर्य सब भात से ही बना
भात से ही बनी हूँ मैं
रोटी की तरह भात भी एक महापृथ्वी है
भात कभी न खत्म होने वाला समय है।
***
 
वो जो किताबों में गिरे हुए फूल रखती थी 
 
चीज़ें लौट लौट कर आती रहीं
दूर फेंके जाने के बाद भी, विलगाये जाने के बाद भी
वे चीज़ें जो हमसे जुड़ी हैं, वे अंत तक हमारे
पास ही रहने के लिए बार बार हमारे पास आईं
परंतु हम मनुष्यवत कुछ न रख सके अपने पास, हमने सब दूर छिटका दिया
अपने पास रखा मात्र अपना स्वार्थ
किसी से मिली सीख, विद्या, नसीहतें, कितना ही रख पाते हैं हम अपने पास
किसी का दिया हुआ सुख, किसी का दिया हुआ दुःख, किसी के गीत, किसी का वियोग
कहाँ ही रख पाते हैं अंत तक
समय हमारे पैरों के नीचे से एक लंकलाट की तरह खींचता रहता है दुःख
और हम जा गिरते हैं सुख के समक्ष
फिर खींचता है सुख हमारे पैरों के नीचें
हम फिर से जा गिरते हैं दुःख के समक्ष
हम कुछ नहीं रख पाते अपने पास
रख पाने की कला से बाहर की ओर उछाले गये लोग हैं हम
हमारी नाक आकाश से ऊँची है, मस्तक में ईश्वर से भी बड़ा दिमाग
आँख पृथ्वी की ओर नहीं देखती, हाथ मात्र छीनना सीख सके
नहीं रख पाते हम कुछ भी पेड़ – पत्ता, प्रेम – अप्रेम, सुंदर – असुंदर, मोह – ढोंग, पानी – प्रकृति, जीव – जन्तु
सब हमने नष्ट किया
 
परंतु मैं जानती हूँ एक ऐसी लड़की को जो पृथ्वी पर गिरे हुए फूल रखती है अपनी किताबों में,                                                    अबोली, अपराजिता, अमलतास, बनफूल, कंद पुष्प, कामिनी, गुड़हल, गुलाब, कनेर, रत्नज्योति, गुलबहार, गुलखैरा, जो भी फूल मिलता रख लेती                                          फूल की देह, फूल के रंग, फूल की कोमलता, फूल की पीड़ा, फूल का फूलपन सबकुछ रख लेती है किताब में
बिन लेती थी सड़क किनारों से, बागीचों से, सीढ़ियों से, पुस्तकालय के बड़े गेट के पास से, पड़ोसी की चौखट से, कहीं से भी जहाँ भी देख लेती थी फूल गिरा हुआ
आती जाती गाड़ियों को रोककर उठा लेती थी फूल एक शिशु की तरह
और किताब कर देती है बंद
फूल पड़े रहते हैं किताब में, जैसे मन में पड़ा रहता है प्रेमी बेरोज़गार
जैसे किताब हो एक भिक्षुणी का झोला और फूल हो संसार का सबसे बड़ा दुःख
इतना बड़ा दुःख कि लगे ईश्वर की योजना से भी छोटा
या जैसे बहुत सारी इत्यादियों के पन्नों के बीच कोई एक हारा हुआ मन
वो लड़की जो पृथ्वी पर गिरे हुए फूल रख लेती है किताबों में
वह लड़की करती थी फूलों से प्रेम, पहनती थी फूलों के रंग, अवश्य ही जानती थी फूलों के दुःख, लगाती थी फूलों के नुक्ते, सहलाती थी  फूलों के उभरे हुए नसों को, देखती थी फूलों की सुंदरता
वह लड़की किताबों के रखकर फूलों को सुखा देती थी उनके दुःख
रसगंगाधर, मनोरमाकुचमर्दनी, अष्टध्यायी, राजतरंगिणी, सुभाषितभाण्डागारम्, सभी में रख देती थी फूल
उन फूलों में अब मकरंद नहीं बनता था
उनमें बनती थी वेदनाओं की सुगंध जिससे सुगंधित होती थी लड़की की निशा
 
कौनसी चाल थी यह लड़की की
मत्त चाल हाथी की या घोड़े की तेज़ चाल
ये प्रेमचाल थी
उसे किसी ने नहीं दिया था कोई फूल कभी
वह जानती ही नहीं थी फूल पाने का सुख
कभी नहीं तोड़ा था उसने डाल से कोई फूल
कोई प्रेमी उसतक फूल लेकर नहीं पहुँचा था
मेरू के समान ज्ञानी नहीं थी वह न ही विष मंजरी समान चतुर
फूल जैसी लड़की ने जीवन भर फूल बिने
जानती थी वह गिराये जाने का दुःख,
गिरने का दुःख, प्रेम से वंचित रहने का दुःख
उससे किसी ने प्रेम न किया, वह एक खाली जगह बन गई
सभी स्त्रियाँ नहीं बन पाती प्रेमिका
मन की छिपी सुंदरता नहीं, मुख की सुंदरता चाहता है प्रेमी
यह सोचकर
अपनी खाली जगह को वह खुद ही भरती रही पृथ्वी पर गिरे हुए फूलों से,
उसके पास धन और गहना नहीं
बहुत सारे सूखे फूल थे
उसकी मृत्यु के बाद मनुष्य नहीं, उसे फूल श्रद्धांजलि देंगे।
***
 
बच्चें हमसे रूष्ट हैं 
 
अल शुहादा स्कूल में पिछले दिनों धमाके में मारी गईं बच्चियों की मेज़ पर फूल रख रहा है एक कर्मी
नहीं हो सकी अफगानिस्तान और तालिबान के बीच शांति वार्ता
नतीजनन मर गईं बच्चियाँ
उधर इस्त्राइल और इस्लामिक आतंकी संगठन हमास के बीच सातवें दिन भी संघर्ष जारी रहा
हमले में तेरह बच्चे मर गये
एक अन्य देश में स्कूल बस उड़ा दिया आतंवादियों ने
सैंतालीस बच्चे वहाँ मरे
 
बच्चे मेरे देश के हों या अन्य किस देश के
बच्चे तो बच्चे ही होते हैं आखिरकार
सच्चे, कोमल, सुंदर
बच्चें ज्वालामुखियों अथवा बादल फटने से नहीं, बम से मर रहे हैं
बच्चें युद्ध में मर रहे हैं
बच्चें महामारी से मर रहे हैं
अभी अभी दुनिया में आये बच्चें, गेंद लपकना भी नहीं सीख पाये हैं, चाँद को देखकर पूछते हैं माँ से कि वो क्या है,
बच्चे अभी दुनिया को अचरज की नज़रों से ही देख रहे हैं
बच्चे हमसे रूष्ट हैं, वे संसार से चले जा रहे हैं
 
बम, महामारी, तोप, युद्ध
बच्चे अभी समझते भी नहीं इन सबका अर्थ
वे अभी अपनी माँओं और दूध की बोतल को ही जीवन समझते है
वे अभी अभी खेलना सीखे हैं
वे अभी सीधी चप्पल भी नहीं पहनना सीखे
कुछ के तो दाँत भी नहीं आये अभी
कुछ अभी तुतला रहे हैं
फिर भी वे जा रहे हैं
बड़ों की हरकतों से नहीं लड़ पा रहे
वे रूष्ट हैं हमसे
बच्चे दुनिया से चले जा रहे हैं
उनकी अनकही मीठी बोली किसी फल को नहीं मिल सकेगी
 
कौन पूछेगा बुद्धिजीवियों से
युद्ध है आवश्यक या बच्चे
वे सभी शब्द, सभी चित्र, सभी आविष्कार, सभी कलाएँ, सभी नृत्य, सभी उत्सव, सभी लेख, सभी कविताएँ, सभी उपन्यास, सभी कृतियाँ जो हमें उन बच्चों से मिलने वाली थीं
वे बच्चों के साथ साथ अकाल मृत्यु को प्राप्त हुईं
 
वे सभी फूल जो वे बच्चें तोड़ते
वे सभी पेड़ जो बच्चें लगातें
वे सभी कारखाने, मंच, प्रकाशन घर, पुस्तकालय, विद्यालय, बागीचे जो वे बच्चें बनातें
वे सब भी बनने से पहले ही नष्ट हुए
वह हर एक चीज़ जो छूते बच्चे
वे खंडित रह जायेंगे, नहीं मिलेगा उन्हें कोई मोक्ष, नहीं मिलेगा कोई अन्य जन्म
बच्चे हमसे रूष्ट हैं
बच्चे दुनिया से चले जा रहे हैं
 
कितना ऊठा है वस्त्र बाज़ार संसार में
बच्चों के समक्ष हम नंगे खड़े हैं
एक आरोपी की भाँति, परंतु हमें कोई फाँसी नहीं दी जायेगी
हम पुनः बच्चे बनाने की प्रक्रिया में भूल जायेंगे मरे हुए बच्चों को
बच्चें जिस मिट्टी में दबाये जायेंगे, सिराये जायेंगे जिस नदी में
उस मिट्टी की धूल और उस नदी का पानी एक दिन बदला लेने उठेंगे हमसे
मिट्टी हमें सान लेगी, नदी डूबो देगी अवश्य ही
 
तब यह डर नहीं होगा कि
कोई डाकू आयेगा और उठा ले जायेगा तुम्हारा अनाज
या कोई अन्य देश का राजा तुम्हें गुलाम बनायेगा
ऐसा भी न होगा कि तुम्हारी अर्थव्यवस्था आ गिरेगी धड़ाम
यह सब बहुत छोटी चीज़ें हैं
सोचो, कोई बड़ी बात नहीं कि कोई नया वायरस आकर हमें नपुंसक बना दें
कुछ नहीं कहा जा सकता भविष्य के खतरों के विषय में अब
धर्म, ईमान, सच्चाई, देश, इज़्ज़त कुछ भी नहीं बचा सको अगर
बचाये रखना बच्चों को
वे ही तुम्हारा भविष्य बचायेंगे
 
संसार के सभी जीवित, मृत बच्चों ने
संसार का नाम कत्लगाह रखा है
बच्चें रुष्ट हैं हमसे
या हम रूष्ट हैं अपनी विवेक से
बच्चें ये दुनिया छोड़कर चले जा रहे हैं
इन्हें बचाओ, इन्हें बचाओ।
***
 
हम उपेक्षाओं की डाल के बंदर हैं 
 
हम उपेक्षाओं की डाल के बंदर हैं
हम मन को कतई यह नहीं सिखा पाते कि हमें अकेले रहना सीखना होगा
एक पीड़ा की आयु मनुष्य से भी बहुत बड़ी होती है
एक मनुष्य की आयु एक पीड़ा ही तय कर देती है
चेष्टाओं से एक आस की नदी निकलकर किसी समुद्र तक नहीं, प्रिय तक पहुँचना चाहती है
हम एक दूसरे की पीड़ाओं को प्रेम देने की चेष्टा में अपनी पीड़ाओं को ढाप देते हैं
एक पत्थर की रगड़ हो जाते हैं, शीत के उपाय के जुगत में ताप में सुख पाते हैं
 
खोजने पर नहीं मिलता कोई एक पुष्प
भी खुद के लिए
मिलने को मिल जाते हैं चाबुक अनेक पीठ पर
लगने को संसार के सारे भिक्षुक भाई बंध लगने लगते हैं
नहीं लगने को कोई नौकरी भी नहीं लगती खुद के लिए
आने को कई रातें एक साथ आ जाती हैं
नहीं आने को कोई रात्रि उत्सव का निमंत्रण नहीं आता दरवाज़े पर
संसार की सबसे सुंदर स्त्रियों को पाते देखती हूँ पुरूषों से प्रेम
संसार की सबसे बदसूरत स्त्रियाँ उबटन करना सीखती हैं यू ट्यूब पर
कविता लिखते समय कोई कोई शब्द अकड़ जाता है, आगे बढ़ता ही नहीं
रख दी जाती है वह कविता अगले इतवार तक
कोई सुंदर चित्र आँखों को एक शांत रात दे देता है
उसी चित्र के बागान में खड़ा मिलता है प्रेमी प्रतीक्षा करता हुआ
दिखने को किसी की आँखों में भी दिख जाती है नीली झील
नहीं दिखने को संसार में आँख से मिलती जुलती एक भी झील नहीं दिखती
केदारनाथ अग्रवाल को पढ़ते हुए कट जाती हैं तीन रातें
सीने से दुपट्टे की तरह उड़ता रहता है मन का सबसे अपंग भाव
अरसा हुआ मन किसी भी चीज़ को देखकर नहीं ठिठकता
मन के भी नीचे एक छोटा मन रहता है
मैं सीढ़ियाँ उतर कर उस छोटे मन में अपने अधिकार की एक पृथ्वी देखती हूँ
एक कोमल स्पर्श खोजती हूँ
एक शत्रु जो महामारी से मर गया, मेरी सफलता तो देख ही नहीं पाया
उसके मरने के बाद लगा न ही मरता, रहता
रह लेता भले ही मेरी असफलताओं के साथ
कमसकम जीवित तो रहता
महामारियों से मृत्यु के बाद क्या पिशाच बनकर घूमता होगा
मृत्यु तो सभी के भाग्य में है
अकालमृत्यु न हो किसी के भाग्य में, कुछ ऐसा उपाय कर दें ईश्वर
एक कीर्तिमय सुगंध में पड़ी रही चंचरी
एक दुर्गंध मेरे लिए जगह बनाती रही
कीट कितने ही भाग्यवान पुरूष से
एक पीड़ा की आयु मनुष्य से भी बहुत बड़ी होती है
आशचर्यजनक है
 
प्रिय की देह मुझे कलम लगती है
मेरी देह कागज़
दुर्भाग्यवश इस कागज़ पर नहीं लिखी गई कोई कविता
हम सभ्य घोषित हुए, न ही हम प्रेम कर सके, न ही छिप के मिलने के खतरे उठाये
अंततः हमने महान होना चुना, प्रेमी नहीं
हमारे पास इतना सामर्थ्य ही नहीं था कि हम अपने भविष्य में जाकर किसी शिशु के माता पिता बनते
फूँस से छत बाँधते, एक वृक्ष लगाते
हम ऐसा कुछ भी नहीं कर सके
हमनें अपनी मनोकांक्षाओं को मृत्युदंड दिया
हम उपेक्षाओं की डाल के बंदर बने रह गये।
***
बातों का एक गुड़ घुलता है प्रेम के जिह्वा के नीचे 
 
अत्रि, जामवंत, कृपाचार्य, परशुराम
कौन कौन है जीवित अभी भी
तारामंडल की ठीक ठीक सच्ची कहानियाँ
कौन कौन जानता है
गवाक्ष, गवय, द्विविद, शरभ
कौन कौन जानता है इन वानरों की जीवनी
झूमरों के टापू के मलबे तले मिली नर्तकियों
की आयु ठीक ठीक किसे पता है
यक्ष जब मेघों को समझा रहे थे अलकापुरी तक पहुँचने का मार्ग
कौन कौन सुन रहा था उन्हें
 
हर बात नहीं जानता हर कोई
हर बात कही नहीं जाती हर किसी से
कुछ बातों की एक लम्बी आयु होती है
कुछ बातों की भ्रूण हत्याएँ कर दी जाती है
कुछ बातों की पपड़ियाँ ओष्ठ पर जमी रहती हैं
कुछ बातें हमारे भीतर आयु भर पिघलती हैं
कुछ बातों को जन्म देकर छिपाकर किया जाता है उनका लालन पालन
पृथ्वी पर जितनी बातें छिपाई गई, उतना तो धन भी नहीं छिपाया गया, न ही प्रेम संबध
किसी को हम नहीं बताना चाहते कोई बात
किसी से हम कह देना चाहते हैं मन की सारी बातें
 
मुझे अरस्तु की बातें प्रिय हैं, सुकरात की बातें अति प्रिय
दो हृदयों की एक सी बातों से जन्मता है विश्वास
मुझे अपनी आयु बढ़ाने के लिए प्रेम से भरी बातों की आवश्यकता है
प्रेम से इतनी भरी हों वे बातें कि अगर उन्हें छुआ जाये तो ऊँगलियों में उतर आये प्रेम और जा पहुँचे किसी के माथे तक
बुखार में कहीं जाये सबसे कोमल बातें जो सीधे छूटकर आईं हों मन के सबसे शिशु हिस्से से
प्रेम से भरी किसी बात में ही मेरे प्राण निकले
वहीं मेरा मोक्ष है
माँ की कही बातें मैंने बच्चों में बाँट दी हैं
पिता की कही बातें मैंने अपनी कविताओं को दे दी हैं
भाई ने जो बातें कहीं वह मेरे दोस्त जानते हैं
बहन होती, तो बहुत कुछ कहती, उसकी कही बातें मैं प्रेयस को अवश्य बताती
दोस्तों की कही बातें मैं शत्रुओं से कहना चाहती हूँ ताकि वे समझ सकें कि मेरा शत्रु होकर वे भिक्षुक ही रहेंगे
मेरे पास भी थोड़ी सी बातें हैं
अभी उन सब बातों को कह पाने में समय है
कुछ बातें मैंने लिखकर ड्राफ्ट में बचाकर रखी हैं, वह शायद किसी से न कह पाऊँ
मेरे बाद उन्हें जो पढ़ सकेगा, वह मुझसे अवश्य ही प्रेम करेगा, ऐसा मेरा अँधविश्वास है
 
बातों का चित्ताकर्षक सौंदर्य देखना हो तो छोटे बच्चों से बात करो
या उससे जिसके भाग्य में हो एकतरफा प्रेम
बातों की एक झिल्ली से बिंधे हैं इस दुनिया के सबसे सुंदर अधर
कुछ बातें छिपी हैं आँखों में
इन्हें वही देख पायेगा जिसे बहुत कम बातें कहने का अवसर मिला
बातें, जो हमारी सबसे क्रियाशील अभिव्यक्ति है, हमें हमारा महत्व चाहे हमें बताये या न बताये
हमें यह तो अवश्य ही बताती हैं कि एक मन भी हर लिया अगर अपनी सच्ची मीठी बातों से तो, तुमसे धनेश कोई नहीं
 
बातों की एक धुनकी मस्तिष्क में सदैव ही नृत्यरत रहती है
बातों का एक हवाईजहाज उड़ता है सबसे ऊँचे बादल के ऊपर
बातों की एक मीन मन में अंत तक प्यासी रहती है
बातों का एक गुड़ घुलता है प्रेम के जिह्वा के नीचे
बातों का एक झुंड हमें अकेला पाकर आक्रमण चिल्लाता है
सारी उपदिशाओं में बातों के अणु तैर रहे हैं
बातों के एक अंतहीन चुप से चौंकती हैं हमारी आँखें
बातों की कुछ हिचकियों से उछलते हैं दो प्रेमी
बातों का एक लाल पुष्प खो़स लेती है नई नई प्रेम में पड़ी लड़की अपनी चोटी में
नये नये प्रेम में पड़ा लड़का बातों के पुष्प से बनाता है जयमाल
 
बातों बातों में ही कह दी गई इस दुनिया की सबसे कड़वी बातें
मीठी बातें कहने के लिए एक अतिरिक्त बात की भी आवश्यकता नहीं पड़ी
मेरे लिए बनाओ बातों की एक पालकी
मेरे होने वाले चार काँधियों, मुझे ले जाते समय तुम सभी अवश्य ही मुझसे कह देना अपने मन की वे सभी दबी बातें जो तुम किसी से कह न सके
मैं अवश्य ही सुनुँगी, उस समय नहीं बोल पाऊँगी कोई बात परंतु तुम्हें आशीष अवश्य ही दे जाऊँगी।
 
 
***
आवश्यक है हर वस्तु से अमोह 
 
हर वस्तु आवश्यक नहीं
अन्न, जल, मधुर वाणी?
हाँ इतना भर तो हो
 
शपथजल, आंब, आस पास रेंगने
के लिए चींटी?
शपथजल न हो तो चलेगा
 
स्वप्न, मित्र, वीणा?
मित्र तो स्वप्न से भी सुंदर
मित्र मीठा बोले तो वही वीणा
 
मेघ, समुद्र, नदी?
नेत्र सबसे बड़ा जलकुंड
 
अग्नि, प्रेयस, ईश्वर?
एक प्रेयस जिसका कर्म अग्नि हो और धर्म ईश्वर
 
आरंभ, अंत, विछोह?
यह तो समय के चप्पू हैं, स्वयं पीछे आयेंगे
 
आयु, उपकार, संदेश?
संदेशों की आयु बढ़ाओ, इससे बड़ा उपकार
कोई नहीं
 
हर वस्तु आवश्यक नहीं
आवश्यक है हर वस्तु से अमोह।
 
***
 
मुझे आया ही नहीं 
 
पिता की तरह क्रीच से क्रीच मिलाकर
कपड़ों पर स्त्री करना
रिटायर हो चुके दरबानों से किस्से सुनना
दोहराई गई पंक्तियों को पुनः  दोहराना
छोटे बच्चों को ठीक ठीक उत्तर देना
मुझे आया ही नहीं
 
एक नई भाषा सीखना
दिमागों के अंदर का भद्दा ढूँढ पाना
जीवन में अपनी पूरी देह से हिस्सा लेना
खूब सारा मोटा पैसा बनाना
मुझे आया ही नहीं
 
रहस्य दिनों तक छिपाये रखना
संयम से एक बार में पूरी कविता लिखना
मोह अमोह से बाहर निकलना
धँसी हुई स्मृतियों को बाहर निकाल फेंकना
मुझे आया ही नहीं
 
नहीं आया मुझे
अपना पुर्ज़ा पुर्ज़ा अलग अलग जगहों पे बाँट देना
जैसे मन एक को दिया जाये और देह अन्य को
नहीं आया मुझे
पीड़ा से विलगना।
 
***
 
एक बंगालन के गोदने में कैद है महाब्रह्माण्ड  
 
एक महापृथ्वी की सुंदरता जमी हुई है बंगालन की कमर की धारियों में
फूस के पीले में छिपी हैं बंगालन की योजनाएँ
आकाश में छितरी हैं काँसे की झिर्रियों के साथ उसकी पीड़ाएँ
बरगद पर बैठी पाखियाँ तीस्ता की व्यथा सुनाती हैं
आम की लकड़ियाँ हवन कुंड को स्वर्ग मान बैठी हैं
खेत पतवार जैसे सुसज्जित बैठक हो,
नदियाँ जैसे कुँवारी कन्याओं की हथेलियों से निकला आशीर्वाद हो
बनबत्तखों के जोड़ों के साथ बंगालन की  धवलिमा पृथ्वी पर चंद्रिकोत्सव मनाती है
संध्या की नारंगी छटा में बंगालन पका रही है इलिश, गा रही है बाउल, पसीने में सिंदूर नाक पर आ टपकता है
पोखर में नहाती है तो, चंद्रमा से भी गहरे उतरती है पानी में
लाल साग, परवल, बत्तख के अंडे, सहजन
एहतियात से रखती है सूती झोले में
चलती है तो सब्ज़ी मंडी आड़ में चलती है
नवयुवक थम जाते हैं
 
मंदिर में माँ काली के समक्ष शंख फूँकती है,
देवी के कान में फूँक देती है दिनचर्या
रात में घिसती है पीतल के बासन
करती है प्रेम, प्रेम करना बासन घिसने जितना सरल नहीं
हाथ में त्रिशूल गुदा है, गोदने में कैद हैं शिव परिवार समेत
एक बंगालन के गोदने में कैद है महाब्रह्माण्ड।
 
***
 
उदासी के देवता पेशेवर नहीं लगते 
 
नीले आईरिस के फूल से भी नीले पड़े हमारे हृदय में एक पुष्प के खिलने भर के लिए एक काँटें जितनी जगह भी नहीं बची है अब
मेरा मुख सुंदर नहीं परंतु तलवें गुलाबी हैं
लेकिन तलवे कोई नहीं देखता
मुझे समझना है तो मेरी उदासियों को समझों
इन उदासियों पर एक भी फूल नहीं आयेगा उगने
स्वप्न सारे मेरे ही रक्त से लाल मिलेंगे
डाकखाने की बंद खिड़की की तरह बंद है मन
डाकखानों की बंद खिड़कियाँ उदासी से भर देती हैं
पत्र लिखे नहीं जाते आजकल
 
ईश्वर हमें गहरे तक खोदता रहा
प्रचुर मात्रा में दुःख का खनिज बरामद करता है
ईश्वर को सृष्टि चलाने के लिए हमारे दुःखों की आवश्यकता थी
छुरी की धार से भी नुकीले अकेलेपन से हमारी स्मृतियाँ नहीं, हम ही कट जाते हैं
 
पक्की सड़कों पर कच्चा मन लिए चल नहीं पा रहे हम
चित्रों पर नज़र आती है आँकी बाँकी उदास रेखाएँ
बंद आँखों में उठती हैं उदासियों की छोटी छोटी लपटें
एक सनक से भरी उदासी धुत्कारती है जब तब
पानी पर दिखाई देता है उदासी का पक्का रंग
संगीत तो पूरा ही नहीं होता जब तक उसपर उदासी की एक फार न रखी जाए
कुछ न कर पाने की एक उदास प्रयास में प्रतिभाएँ सारी छिप जाती हैं
उदासी का एक बिचका लटका मुँह गर्दन पर टिक नहीं पाता
इस्त्री किए हुए कपड़ों पर भी उदासी का एक कुचक दिख ही जाता है
 
एक सम्पूर्ण उदासी हमें रतजगे दे पाने में कतई सक्षम नहीं
एक अप्रयोज्य उदासी हमारा पीछा नहीं छोड़ती
एक गरज से भरी उदासी स्मृतियों को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि देती है
किश्तों में मिल रहीं हैं उदासियाँ हर रोज़
उदासी के देवता पेशेवर नहीं लगते।
 
***
 
 
एक औषधि की घोंट है स्त्री 
 
एक घोंट की कम हवा
साँसों को घूरती है
घूरती है आँखों का कंपन, नसों को छेदती है
एक स्त्री घोंट रही है अपना रक्त
छीन रही है अपनी साँसें
बच्चों को दे रही है गेंद
खुद टप्पे खा रही है
पुरूषों को खिला रही हैं फूली रोटी
खुद नहीं फूल पा रही
 
घावों को भर जाने का वरदान है
नहीं तो स्त्रियों से कुरूप और बेसुरा कोई नहीं होता
दिखने वाले घाव भर देता है समय
फिर निखर आता है स्त्री का रूप
चीखें घुट जाती हैं दीवारों  में
सुरहीन होने से बच जाती है स्त्री
करूणा से भर जाता होगा ईश्वर का मन
ईश्वर का मन हो जाता होगा एक स्त्री जैसा अवश्य
चेहरा भी एक स्त्री जैसा, हाथ, पैर, पेट, कमर, गर्दन सब स्त्री जैसा हो आता होगा
पर एक स्त्री होकर कितनी देर ही रह पाता होगा ईश्वर
एक दहशत भरी घटना झेलने में असमर्थ होकर, धम्म से
गिर जाता होगा
अगले क्षण पुनः बन जाता होगा ईश्वर
स्त्री बनाना कितना महान कार्य है
स्त्री होना कितना असफल
 
जन्म लेने पर एक स्त्री ने ही साफ किया या तुम्हारा काला मल
एक स्त्री ने ही तुम्हें पोसा,
एक स्त्री ने ही तुम्हारे जनेऊ के लिए सब तैयारियाँ की, भोज पकाया ब्राह्मणों के लिए
एक स्त्री ने ही बिस्तर बिछाया तुम्हारे लिए
एक स्त्री ने ही बिस्तर पर तुम्हें एक मर्द बनाया
एक स्त्री ने ही तुम्हें जीत के लिए किया तैयार
एक स्त्री ही तुम्हारे जीत में झण्डा बनकर लहराई
जब गिरे तुम मूर्छा में, एक स्त्री ने ही तुम्हें बटोरा, खिलाई तुम्हें दवाई
तुम्हारे मरण पर एक स्त्री ही सबसे ज़्यादा रोई
मरण के बाद एक स्त्री ही चढ़ाती रही तुमपर माला
बरसी के लिए पकाती है भोजन
हाथ जोड़कर करती है तुम्हारे लिए प्रार्थना
 
एक स्त्री अंततः चुप हो जाती है
उसकी चुप से कान सटाकर कुछ सुनने का प्रयास मत करना
उसके चुप में दुःखों की ध्वनियाँ हैं,  ग्रहों के खिसकने की भरकम ध्वनियों से मिलती जुलती ध्वनियाँ हैं
चीखें हैं, कीकें हैं, बादल नहीं हृदय फटने की ध्वनियाँ हैं
तुम बहरे हो सकते हो
 
जब लगे तुम्हें तुम्हारे वश में नहीं है कुछ
ठहरो एक स्त्री के समीप, उसकी उर्जा से शक्ति लो
ओज लो उसके चेहरे से
उसकी आँखों से सीखों खाईयाँ लाँघना
सीखो उसके हाथों से कैसे दुःखों को सिलकर अपने लिए छत बनाते हैं
 
तुम प्रेमवश उसके पैरो को अपने हथेलियों पर रखकर
उन्हें चूमकर उसे देवी बना दो,
बना लो उसे अपनी रक्षिणी
एक औषधि की घोंट है स्त्री, उसे कंठघूँट से नहीं
अपने ज्ञान से पियो, एक एक घूँट हर रोज़
एक स्त्री ही तुम्हें जिलाये रखेगी।
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जोशना बैनर्जी आडवानी आगरा के स्प्रिंगडेल मॉर्डन पब्लिक स्कूल में प्रधानाचार्या पद पर कार्यरत हैं। इनका जन्म आगरा में ३१ दिसंबर, १९८३ को हुआ था। पिता बिजली विभाग में कार्यरत थे। सेंट कॉनरेड्स इंटर कॉलेज, आगरा से शिक्षा ग्रहण करने के बाद, आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद बी.एड, एम.एड और पीएचडी की। इनका पहला कविता संग्रह “सुधानपूर्णा” है, जो इन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता को समर्पित किया है। दस साल पीजीटी लेवल पर अंग्रेज़ी पढ़ाने के बाद इन्होनें प्रधानाचार्या पद संभाला। इनका अधिकांश समय कोलकाता में बीता है। बोलपुर और बेलूर, कोलकाता में रहकर इन्होंने कत्थक और भरतनाट्यम सीखा। प्रधानाचार्या होने के साथ साथ वर्तमान में ये सीबीएसई के वर्कशॉप्स कराती हैं और सीबीएसई की किताबों की एडिटिंग भी कर रही हैं। इनकी कविताओं में बांग्ला भाषा का प्रयोग अधिक पढ़ा जा सकता है। इनका दूसरा कविता संग्रह “अंबुधि में पसरा है आकाश” वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। रज़ा फाउंडेशन की ओर से इन्हें शंभू महाराज जी पर विस्तृत कार्य करने के लिए 2021 में फैलोशिप मिली है।