Latest

6/recent/ticker-posts

‘ इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ खुदा ' -ऋत्विक भारतीय

 



         ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ आत्मकथा से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अप्रतिम  पहचान बनाने वाले प्रोफेसर श्यौराज सिंह बेचैन की ‘मेरी प्रिय कहानियां’ (कहानियों) का संकलन अभी हाल में देखने को मिला।

इनसे  गुजरने के पश्चात यह कहना जरूरी हो जाता है- ‘बैचेन’ हमेशा से अपनी अव्वलगिरी के लिए भी जाने जाते हैं। विदित हो ‘बैचेन’ प्रथम दलित लेखक हैं जिनके प्रथम शोध प्रबंध  -‘हिन्दी दलित पत्रकारिता पर अंबेडकर का प्रभाव’ जैसी सरीखी पुस्तक ने वर्ष 1999 में ‘लिम्का बुक ऑफ रिकॉड’ कायम किया था। ये प्रथम दलित लेखक हैं जिनकी आत्मकथा का अंग्रेजी आनुवाद –‘माई चाइल्डहुड’ ऑक्सफोर्ड जैसी विश्व-प्रसिद्ध संस्था ने प्रकाशित की । ये प्रथम दलित लेखक हैं जिन्हें हिन्दी अकादमी की और से ‘गद्य सम्मान’ से सम्मानित किया गया। अग्रलिखित बातों को प्रकाशान्वित करना इसलिए भी जरूरी हो जाता है; क्योंकी ‘राजपाल एण्ड सन्स’ जैसी प्रतिष्ठित संस्था से प्रकाशित होने वाली अब तक की ‘मेरी प्रिय कहानियां’(कहानियों) की फेहरिस्त में भी ‘बैचेन’ प्रथम दलित लेखक हैं!

    बात अगर कवि-कथाकार-आलोचक प्रोफेसर श्यौराज सिंह ‘बैचेन’ की कहानियों की की जाए तो यह कहना जरूरी हो जाता है की छोटी-से-छोटी घटना या स्मृति-खंड का टुकड़ा भी लेखक के अंत:करण का स्पर्श पा कहानी में तब्दील हो जाता है। संकलन की सभी कहानियों मे जो बात उभयनिष्ठ लक्ष्य की जा सकती है वह है- मार्मिकता!

दूसरी बात जो यहां लक्ष्य की जा सकती है वह यह है की ये कहानियां अनावश्यक अलंकरण और श्रृंगारिकता से परहेज करती हैं और बिना आक्रोशित किये दलित होने के कर्म-धर्म को बड़ी शिद्दत के साथ निभाती हुई- समता, स्वतंत्रता और धर्म-निरपेक्षता जैसे मानवीय मुद्दों के कई ज़्वलंत प्रश्न कीलित करती हैं, ये प्रश्न महज एक प्रश्न मात्र नहीं, बल्कि घने अंधकार में एक मशाल की तरह सुदूर पथिकों के पथ को आलोकित करते हैं और नि:संदेह अतिताइयों एवं अतिवादियों को अंत:करण परिवर्तन का अवसर प्रदान करते हैं । और इस तरह बैचेन जी की ‘मुक्ति’ केवल दलितों एवं स्त्रियों की मुक्ति तक ही सीमित नहीं रह जाती, बल्कि स्वत: मानव-मुक्ति से आ जुड़ती है!

सबसे बड़ी विशेषता जो मुझे इन कहानियों में दिखती है वह यह है कि लेखक किसी अतिवाद से प्रेरित नहीं, बल्कि अम्बेडकर – सी करुणासम्बलित न्याय दृष्टी का प्रभाव लेखक पर अधिक है। रक्त के बदले रक्त या आंख के बदले आँख वाला दर्शन इनके यहां नहीं! होना भी नहीं चाहिये, अन्यथा इस दर्शन या सिद्धांत पर तो पूरी धरती ही रक्तरंजित हो जाएगी या हो जाएगी, हो जाएगी पूरी घरा ही अंधी!

    इस तरह बेचैनजी की इस करुणासम्बलित न्याय दृष्टि को लक्ष्य कर उनकी इन कहानियों के संबंध में गालिब का यह कथन स्मरण हो आना स्वभाविक हो जाता है:

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ खुदा 

लड़ते हैं और हाथों में तलवार भी नहीं।

जो लोग कहानी को समयकाटू या मनोरंजन के उद्देश्य से पढ़ते हैं उन्हें ये कहानियां दूर से ही सलाम करती हैं। स्वयं लेखक के शब्दों में ही देखा जाए: सविंधान सापेक्ष सामाजिक दायित्वबोध की दिशा में रचनात्मक योगदान हैं।

संकलन में कुल नौ कहानियाँ हैं जिसमें प्रथम कहानी ‘क्रीमीलेयर’ है।  ये कहानी दम्पती- सुधांशु और प्रणीता के बौद्धिक संवाद के माध्यम से अपना रास्ता अख्तियार करती, आगे बढ़ती है और अंततः वर्तमान में एससी, एसटी में क्रीमीलेयर लागू किए जाने की साथर्कता और नीरर्थकता को स्पष्ट कर जाती है!

संग्रह की दूसरी महत्त्वपूर्ण कहानी ‘बस्स इत्ती सी-बात’ है जिसमें जात्याभिमान और सामंतीय मानसिकता से ग्रसित ठाकुर कुंवर सिंह अपनी परित्यक्त स्त्री की हत्या बस इसलिए कर देता है, क्योंकि उसकी परित्यक्ता ने तथाकथित किसी निम्नजाति के व्यक्ति से पुनर्विवाह कर लिया था। विडम्बना ऐसी की हत्या करने के बाद भी अपराधबोध की बजाय उसका जात्यभिमान मीडिया के सामने गर्व से फूट पड़ता है, ‘जिस औरत का मेरे उच्च कुल से संबंध रहा हो वह---------- अछूत जाति के ऐरे-गेरे व्यक्ति से पुनर्विवह किया’।

‘कलावती’ कहानी जहां एक ओर आजादी के मायने को रेखांकित करती है वहीं दूसरी ओर कलावती के माध्यम से अस्तित्व और अस्मिता की जद्दोजहद करती समता, स्वतंत्रता जैसे मानवाधिकारों से वंचित बहुसंख्य समाज की असंख्य कलावतियों की कहानी को कलमबद्ध करती है। कहानी अंतत: ऐसे कई सार्थक प्रश्न छोड़ जाती है जिससे बचकर निकल पाना किसी के लिए संभव नहीं! इन प्रश्नों की विशेषता यह है की ये केवल बैचेन ही नहीं करते, बल्कि समाज में अमूल चूल परीवर्तन के लिए भी प्रेरित करते है, ‘‘महान शहीद भगत सिंह जी....... आपने अंग्रेजों को भगाया और देश को आजाद कराया, कुर्बानी दी पर तुम्हारे देश के गुलाम बच्चे तो गुलाम ही रह गए। उनके लिए तालीम, धंधा, व्यवसाय, मुनाफा का सौदा बनाकर स्कूलों को देश से छीन लिया। निजी बपौती बना दिया जो खरीदे। सो आजाद होकर इसी दिन के लिए अंग्रेजों को भगाया। क्या इन धन वाले, जात वाले लोगों को सौंप देने को आजादी ली थी?’’

‘शिष्या-बहू’ कहानी ‘जाति तोड़ो समाज जोड़ो’ जैसे अम्बेडकर मिशन से जुड़ती हुई, गांधी जी की ‘अस्पृश्यता उन्मूलन’ से भी आ जुड़ती है। प्रस्तुत कहानी ब्राह्मण सास- विद्या शर्मा और बहू- गुल्लो के विरोधाभास को अभिव्यक्त करती हुई गुल्लो के संघर्ष और सफलता को दर्शाती है।

‘अस्थियों के अक्षर’ संग्रह की सर्वाधिक मार्मिक और हृदयस्पृशी कहानी है जो शायद लेखक की पहली कहानी भी है। (हंस,फरवरी 1996) ये मन-मस्तिष्क और ह्रदय पर अमिट प्रभाव छोड़ती है! जिसके संबंध में कहा जा सकता है:

आसां नहीं है लिखना गम-ए-दिल की वारदात

कि अपना कलम लहू में डुबोना पड़ा है मुझे।

विश्व की कई भाषाओं में अनूदित यह कहानी कई स्तर पर पाठक को भीतर से झकझोरती है, जैसे- सौतेले पिता का दंश, स्त्री प्रताड़ना का दंश, बालश्रम और विस्थापन का दंश इत्यादि।

अम्बेडकरवादी चेतना की दृष्टि से भी देखा जाए तो यह कहानी ‘संघर्ष करो और शिक्षित बनो’ का नारा भी बुलंद कर जाती है। संक्षेप में कहा जाए तो यह कहानी सौतेले पिता के दंश से पीड़ित-विस्थापित एवं अभावग्रस्त बालक के संघर्ष और सफलता की अद्भूत मिसाल पेश करती है!             

‘सिस्टर’ संलकन की सबसे छोटी किन्तु भावप्रवण कहानी है जिसमें एक मासूम युवती और जज्बाती युवक के माध्यम से मानवीय प्रेम का उच्च आदर्श स्थापित किया गया है।

‘लवली’ कहानी प्यार के झांसे में फंसकर अपना सर्वस्व गवाँ बैठी लवली के बहाने असंख्य लड़कियों के स्वाभिमान की लड़ाई का प्रश्न खड़ा करती है।

     ‘रावण’ कहानी दलितों के विस्थापन के दारुण सत्य को उद्घाटित करती हुई जातिभेद के कई ज्वलंत प्रश्न खड़े करती है। यह कहानी स्पष्ट करती है कि गांव में अब भी दलित जात्याभिमान के शिकार हैं। हालांकि शहर भी इससे अछूता नहीं! उदाहरण के तौर पर अभी हाल में ही दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग का मामला देखा जा सकता है। जहां हर वैधानिक योग्यता के बावजूद एक दलित प्रो. को अध्यक्ष बनने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा, तो केवल इसलिए की वह दलित था! लोकतंत्र की इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है?

संकलन की सबसे अंतिम कहानी ‘आंच की जांच’ है जो 'हंस' के नवम्बर 2019 के अंक में प्रकाशित हुई थी।

 जात्याभिमान का चरम इससे बढ़कर और क्या हो सकता है की किसी बच्चे की जाति जानने मात्र के लिए न केवल रुपया पानी कि तरह बहाया जाता है बल्कि समय और श्रम भी।

उपर्यूक्त सभी कहानिया नि:संदेह लेखक की प्रिय कहानियां हैं पर अगर बात लेखक की लोकप्रिय कहानियों कि की जाए तो बेचैन जी की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों को रेखांकित करना चाहूँगा- ‘भरोसे की बहन’(कथादेश,जून 2004), ‘शोध-प्रबंध’(हंस,जुलाई 2000) और ‘शीतल के सपने’(जनसत्ता, रविवारीय मैगजीन,2/12/2007)!

ये कहानियाँ देशकाल-सविंधान-सापेक्ष होने के साथ-साथ, यथार्थ पात्र, बौद्धिक किन्तु सरल और प्रभावी संवाद, सरल-सहज जनभाषा के रूप में चित्रात्मक शैली में सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक जैसी तमाम विडंबनाओं को केवल उजागर की नहीं करती बल्कि उचित निराकरण भी देती हैं। जिसका सीधा-सीधा सम्बंध ‘अम्बेडकरी मिशन’ और गाँधीवादी ‘अस्पृश्यता-उन्मूलन’ से है।

बात अगर वर्तमान समय में इन कहानियों की प्रसांगिकता कि की जाए तो कहना न होगा जब तक समता, स्वतंत्रता और न्याय जैसे मानवधिकार बिना किसी भेदभाव के पूर्णत: हर व्यक्ति को नहीं मिल जाते तब तक इन कहानियों की प्रसांगिकता पर ‘अ’ प्रसांगीकता का आरोप मढ़ना निरर्थक होगा!

                           ----------------------------


ऋत्विक भारतीय 

शोधार्थी,दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ।

संपर्क 9958641461

Email-ritwikbharatiya.55@gmail.com                                                    

Post a Comment

0 Comments