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धुआं है न शोला - पूनम सिंह

 

                                                   

                                             

        विक्रमचंद मानविकी शोध संस्थान में मीनल अवस्थी को हर कोई जानता है। इस जानने का कारण उसका जितना सुख्यात होना है, उतना ही कुख्यात होना भी। उसने पिछले साल विश्वविद्यालय के मानविकी संकाय के सभी विभागों के दस वर्षों का रिकार्ड तोड़कर पी० जी० टॉपर होने का रिकार्ड बनाया था। वह बला की खूबसूरत भी है लेकिन उसका सौंदर्य लोहार की भट्ठी में दहकते शोले की तरह है - लोग दूर से ही उसकी दाह महसूस करते हैं, छूने की हिम्मत किसी में नहीं। उसके सुख्यात होने के पीछे मुख्य रूप से ये दो कारण ही सबसे महत्त्वपूर्ण हैं परन्तु उसके कुख्यात होने के पीछे उसकी आवारागर्दी के कई दुःसाहसिक कारनामे हैं।

                एम० फिल करती हुई पी० जी० हॉस्टल में उसकी रूम पार्टनर तीन बार बदली गई। सबके साथ वही एक ही बात सी इज हॉरिबुलउसके साथ रहना कठिन है। वार्डन ने एक दिन झल्ला कर मीनल से पूछा - क्या कारण है कोई लड़की तुम्हारे साथ रहना नहीं चाहती ? सबकी एक ही शिकायत है कि तुम्हें बर्दास्त करना कठिन है।

                मीनल मासूमियत से बोली - लेकिन मैंने तो कभी किसी से अभद्र व्यवहार नहीं किया मैम। किसी की चुगली भी कहीं नहीं की। मेरी तो बिलकुल उनसे अलग-थलग अपनी एक बोनसाई दुनिया है - जिसमें मैं बेफिक्र होकर रहती हूँ। वे जब जागती होती हैं, मैं सोती हूँ और वे जब सोती होती हैं, मैं जागती हूँ। फिर मुझे बर्दास्त करना क्यों कठिन है उनके लिए ?’

                वार्डन गुस्से में बिफर पड़ी - क्या यह सही नहीं है कि तुम अपने तकिए के नीचे तम्बाकू कत्था चूना और न जाने क्या-क्या रखती हो और हथेलियां पर उसे मसलकर खाती पूरी रात जुगाली करती हो। रात भर कमरे की बत्ती जलाकर दूसरे की नींद खराब करना - कमरे को बेतरतीब और गंदा रखना, बीड़ी सिगरेट पीना , तम्बाकू खैनी खाना- क्या ऐसी गंदी आदतें लड़कियों को शोभा देती हैं ?’ वार्डन एक सांस में उससे तलब कर रही थी। 

                मीनल की बड़ी-बड़ी आँखों में हास्य की फुलझड़ी जल उठी। उसने वार्डन से बहुत विनीत स्वर में पूछा - लड़कियों को और क्या-क्या शोभा नहीं देता मैम ?’

                शट अपमैं तुम्हारी शिकायत डीन से करूँगी। यू आर हॉरिबल ----- । वार्डन उल्टे पाँव वहाँ से लौट गई थी।

                दूसरे दिन ही मीनल अवस्थी को गर्ल्स हॉस्टल छोड़ने की नोटिस मिली लेकिन दूसरी ओर उसी दिन अंग्रेजी अखबार में उसकी तस्वीर के साथ उसके लिए एक खुशखबरी भी छपी। कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी में उसके द्वारा भेजे गये रिसर्च पेपर को वहाँ के द हिस्टारिकल जर्नलने महत्त्व देकर प्रकाशित किया था और उसे दो महीने बाद होने वाले वर्ल्ड कॉन्फ्रेन्स में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित भी किया गया था। मीनल को बधाईयाँ मिल रही थीं लेकिन मीनल अपनी इस उपलब्धि से सर्वथा तटस्थ और निरपेक्ष होकर सीधे कुलपति आवास पर एक आवेदन के साथ पहुँची, जिसमें गर्ल्स हॉस्टल छोड़ने की नोटिस के विरुद्ध उसने ब्यॉज हॉस्टल में अपने लिए रूम आवंटित करने की माँग की थी।

                विश्वविद्यालय के लिए मीनल की यह माँग एक खबर बन गई। वैसे तो युनिवर्सिटी कैंपस में वह पहले भी एक खबर की तरह ही देखी, सुनी और पढ़ी जाती थी। कभी खबर उड़ती कि मीनल आज कैंपस के कैंटीन में हँसते बोलते सहपाठियों के बीच देश की मौजूदा राजनीति पर गरमा गरम बहस करते हुए इस तरह उखड़ गई कि उसके प्रतिकार में राष्ट्रवादी कहे जाने वाले छात्र संगठन ने उग्र रूप धारण कर लिया। बीच बचाव करने के लिए कई दिग्गज प्रोफेसरों और सहपाठियों को दौड़ना पड़ा तो कभी सुनने को आता कि मीनल ने प्रो० विनोद झा को डेमोक्रेटिक मॉडल पर कई जटिल प्रश्न पूछ कर क्लास में ही निरुत्तर कर दिया। अपनी बौद्धिक समृद्धि और अपार जिज्ञासा के कारण वह कई विद्वान प्राध्यापकों की चहेती भी थी तो कई प्राध्यापक उससे कन्नी काट कर भी चलते थे। उसकी प्रकृति अध्ययनशील थी लेकिन ज्ञान आचरण अत्यधिक उद्धत और बेलाग।

                ब्यॉज हॉस्टल में रहने की उसकी माँग ऐसी ही उद्धत, बेलाग और अप्रत्याशित थी, जिससे विश्वविद्यालय प्रशासन परेशान और हैरान था। एक लड़की लड़कों के हॉस्टल में रहने के लिए आवेदन कर रही है। यह पदाधिकारियों के लिए सहज स्वीकार करने योग्य बात नहीं थी। लिहाजा आवेदन पर विमर्श हुआ, तर्क वितर्क हुए फिर कठोरता से यह निर्णय लिया गया कि यह निंदनीय और अशोभनीय माँग है। इसे नहीं माना जा सकता।

                मीनल हार मानने वाली लड़की नहीं थी। वह अपनी जनतांत्रिक माँग के साथ भूख हड़ताल पर बैठ गई । उसकी माँग के पीछे ठोस और अकाट्य तर्क थे कि वह विश्वविद्यालय की सबसे प्रतिभावान छात्रा है। उसे एम० फिल के लिए कैंम्पस की सुविधा चाहिए। अगर लड़कियाँ उसके साथ एडजस्ट नहीं कर रही हैं तो वह लड़कों के साथ एडजस्ट कर लेगी। उसने अपने आवेदन में इन सारी बातों के साथ स्त्री अस्मिता और लिंग भिन्नता के प्रश्न पर प्रशासन के आगे ढ़ेर सारे सवाल भी खड़े किये थे। उसने पूछा था -

                ‘‘र्ग्लस हॉस्टल में लड़कियों के बाहर जाने और लौटने का समय निश्चित क्यों है ? क्यों सात बजे शाम के बाद र्ग्लस हॉस्टल का गेट बंद हो जाता है ? सेंट्रल लाइब्रेरी में पढ़ने गई हुई लड़कियाँ और शोध के लिए    अध्ययन सामग्री जुटाती कई शोध छात्राएँ आधा अधूरा काम छोड़कर जेलखाने में लौटने को विवश होती हैं। उन्हें मन मुताबिक कपड़े पहनने, पुरुष मित्रों के साथ घूमने-फिरने पर भी वार्डन पाबंदी लगाती हैं। क्या पुरुष मित्रों के साथ घुलना-मिलना व्यभिचार को बढ़ावा देना है ?’’

                ऐसे कई प्रश्नों को खड़ा कर उसने विश्वविद्यालय के भीतर गहराते सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और शुचितावादी मानसिकता की ध्ज्जियाँ उड़ाई थी। पाँच पृष्ठों के अपने आवेदन में मीनल ने बहुत साफ-साफ शब्दों में लिखा था - ‘‘हमारे विश्वविद्यालय में खाप पंचायतकी एक नई अवधारणा जन्म ले रही है। स्त्री देह को संस्कृति बताकर हमारे लिए कई नीतियाँ, पाबंदियाँ सुनिश्चित की जा रही हैं। शुचितावादी इन नीतियों - पाबंदियों के विरुद्ध हम अपने बोलने की अपने रहने की जगह पैदा करना चाहती हैं। हमें लड़की की तरह रहने की तालीम नहीं चाहिए। हमें स्वतंत्र परिवेश में विकसित होने का समान अवसर चाहिए। हमारा जीवन, हमारी चाहत, हमारे सपने अगर हमारे लिए नहीं तो किसी के लिए क्यों हो ? हम परजीवी वृक्ष नहीं आत्मजीवी वृक्ष बनना चाहती हैं।’’

                मीनल के ऐसे दहकते प्रश्न से परिसर की हवा गर्म हो गई थी। छात्र छात्राओं के बीच बहसें छिड़ गई थीं। लिंगभेद और जेंडर के प्रश्नों पर मीनल की माँग एक नये रूप में परिभाषित होकर आंदोलन का रूप लेने लगी थी। उसी दिन वीमेंस स्टडीज सेंटर के राष्ट्रीय सेमिनार में बतौर मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित आन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय अहमदाबाद के प्रोफेसर नीलाम्बर ने कुलपति आवास के गेट पर बैठी मीनल की जनतांत्रिक माँग को जायज ठहराते हुए अपने वक्तब्य में उसे इतना प्रोमोट किया कि वह पूरे विश्वविद्यालय में जेंडर इक्वालिटी की ब्रांड ऐमबेस्डर घोषित हो गई। उसके साथ जत्थावार वीमेंस स्टडीज सेंटर एवं रेडरोज गर्ल्स हॉस्टल की कई छात्राएँ तथा ठक्कर बाबा ब्यॉज हॉस्टल के छात्र धरने पर बैठने लगे। प्रचलित नैतिकता और मर्यादा के विरुद्ध नारीवादी आग्रह और हठ का यह ऐसा प्रतिरोधी स्वर था, जिससे विश्वविद्यालय प्रशासन और अनुशासन दोनों डगमग होने लगे।

                                                                                X  X  X  X             

                अगली सुबह अखबार के पृष्ठों पर मीनल एक खबर बनकर छपी। उसकी माँग सुर्खियों में रेखांकित की गई थी। बासंती बयार में लिपटा वह फरवरी का महीना था-सामने वैलेंटाइन डे था और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर रोमियो ऑपरेशन का दौर पूरे देश में चल रहा था। दूसरी ओर विश्वविद्यालय कैंपस में स्त्रीवादी एजेंडा के पक्ष-विपक्ष में छात्रों के दो गुट अनायास आपस में टकराने लगे थे। शुचितावादी विचारधारा के कई छात्र अपने नेता संदीप सिंह और उसके सबसे करीबी मित्र यशपाल के कमरे में वैलेंटाइन डे की रणनीति बनाने इकट्ठे हुए थे। खाने पीने का दौर चल रहा था। उसी बीच वेदप्रकाश ने अंगूरी रस की घूंट भरते हुए कहा-संदीप भाई ,आज प्रधानमंत्रीजी की तरह मैं भी अपने मन की बातकहना चाहता हूँ। आप इजाजत दें तो कहूँ ?’ संदीप की नशीली आँखें उसकी ओर उठ गईं। लेकिन उसके चेहरे पर एक अभेद्य खामोशी और कठोरता व्याप्त थी, जिसे देखकर वेद प्रकाश सहम गया।

                यशपाल ने वेद को तसल्ली देते हुए कहा -यार तू हम सबसे अपने मन की बात कर ले। संदीप भैया को अभी मत छेड़। उन्हें लालपरी के साथ आत्मसमाधि में रहने दे।

                वेद पर नशा चढ़ने लगा था। उसने यशपाल की आँखों में झाँकते हुए कहा -इसबार प्रेमदिवस पर, मैं चाहता हूँ एक गुलाब का फूल देकर हम सब अपने वैलेंटाइन से प्रेम निवेदन करें। देख यार ! उत्ताल हवा हमारे द्वार पर दस्तक दे रही है - हमें द्वार खोलकर कर उसका स्वागत तो करना चाहिए न। लड़कियाँ हमारी रूममेट बनने को तैयार हैं। अब तक शबनम की बूंदों को दूर से ही निहारा किये हम - पहली बार आग की बारिश में भींगने का मजा मिलेगा हमें और इधर देख, संदीप भाई अपनी ही आग में अपना चेहरा सिझा रहे हैं।

                वेदप्रकाश की बातों पर कमरे में बैठे अन्य साथी हो-हो कर हँस पड़े। संदीप का चेहरा वैसा ही सख्त बना रहा। यशपाल ने उसके तने चेहरे को देखकर साकी के अंदाज में रम का एक छलकता जाम उसकी ओर बढ़ाते हुए शायराना अंदाज में एक तुकबंदी की  -

                शराबबंदी में अल़फाज का रूठना अच्छा नहीं

                यार कुछ बोल, मयखाने में यूं चुप रहना अच्छा नहीं

                वाह-वाह के दाद से कमरा गूंज उठा। जाम से जाम टकराने लगे, तभी अविनाश ने मित्रों को हिदायत दी-देखो सूबे के मुख्यमंत्री को खबर लग जायेगी, सब जेल चले जाओगे। अधिक मत बहको तुम सब। उधर कोने में देखो, हमारे हॉस्टल का सारा हॉकी स्टीक संदीप भैया ने एक जगह इक्कठा करवा लिया है। प्रेम दिवस को हम इसबार शौर्य दिवस के रूप में मनायेंगे। क्यों संदीप भैया ?’

                संदीप अपने भीतर कहीं गुम था। उसकी चुप्पी में सबने एक बबंडर का संकेत महसूस किया।

                अचानक संदीप की चुप्पी टूटी और उसने वेदप्रकाश से पूछा- आज गौतम ऋषि के पीएच० डी० का भाइवा हो गया ?’

                हाँ भैया - ठक्कर हॉस्टल का छात्र नेता अब डॉ० गौतम ऋषि कहलायेगा। मीनल के ग्रूप की सारी लौंडिया आज उसे विश कर रही थीं। मीनल की लड़ाई में वह इन दिनों धीरोदात्त नायक की भूमिका निभा रहा है। दोनों वैलेंटाइन हो गये हैं एक दूजे के लिए।

                वेद प्रकाश की बातें सुन संदीप की आँखें अचानक भभक उठीं।

                जिस चेहरे, जिस देह पर उसकी आँखें गड़ी थीं, जिस चाँद को अँजुरियों में निचोड़कर पीने की हसरत लिए वह आज तक प्रतीक्षारत है, वह एक दलित छोकरे गौतम ऋषि की वैलेंटाइन कैसे हो सकती है ?

                इस सोच से क्षण में उसका चेहरा विद्रूप हो उठा। तमतमाये चेहरे पर उन्मत और हिंसक लकीरें खींच गईं।

                यशपाल संदीप को गौर से देख रहा था। उसे संदीप के भीतर की थाह लग गई थी। फ्लैशबैक की तरह उसकी चेतना में कुछ महीने पहले का वह दृश्य कौंध गया - सेन्ट्रल लाइब्रेरी के बड़े से गलियारे में संदीप पर निशाना साधती मीनल की दहाड़ती आवाज उसके कानों से टकराई थी - हाउ कैन यू डेयर इट ? खबरदार जो आइंदा मेरे रास्ते आये। रीढ़विहीन, विचारहीन लोगों को मैं घास नहीं डालती। खाप पंचायत की मुखियागिरी करते हो वही करो और बिना दाँत के जबड़े भी वहीं दिखाओ। मैं नहीं डरने वाली तुम जैसों से - आई हेट यू।

                पल में संदीप के हाथों के घेरे को झटकती हुई वह आँखों से ओझल हो गई थी। 

                यह महज एक संयोग ही था कि सेंट्रल लाइब्रेरी के उतने बड़े गलियारे में संदीप की इतनी बड़ी बेइज्जती का गवाह उस दोपहरी में कोई दूसरा नहीं बना। यशपाल ने लाइब्रेरी के वाशरूम के गेट से जो दृश्य देखा और सुना था, उसपर सहज विश्वास करना उसके लिए कठिन था। लेकिन उसने इस वीभत्स मंजर को भूल जाने में ही अपनी भलाई देखी। वह अपने मित्र के जुनूनी स्वभाव और असाधारण गुस्सा को जानता है। उसके इतने बड़े अपमान के दंश का पता किसी और को भी हो गया है, इसे वह कत्तई बर्दास्त नहीं कर सकता और उसके बाद की अनहोनी की कल्पना यशपाल नहीं करना चाहता था। इसलिए इस देखे सुने को अपने भीतर गोड़ कर वह कुछ देर बाद संदीप के सामने आया था। तबतक फण काढ़ा हुआ प्रणय का वह ज्वार पानी-पानी होकर अतल में समा गया था -----।

                लेकिन आज एक बार फिर चोट खाया हुआ वह फण उसे संदीप की आँखों में लहराता दिख रहा था। यशपाल को लगा जैसे मीनल का गौतम ऋषि का वेलेंटाइन कहा जाना संदीप के मन मस्तिष्क के भीतर एक गोली के आर-पार हो जाने जैसी बात है। संदीप लगातार पीता चला जा रहा था और हर घूंट के साथ उसके चेहरे पर कई रंग आ जा रहे थे। एकतरफा प्रेम का यह पागलपन है या कुछ और - यशपाल समझ नहीं पा रहा था।

                तभी अविनाश चुहलबाजी करता हुआ बोल उठा - ‘‘यशपाल भैया, इसबार के प्रणय दिवस की दुपहरी में हम सबको कँटीले बाड़ से एक फूल अपने लिए चुनना है। कुछ गुरूमंत्र तो दे दीजिए भैया। हिड़िम्बा, ताड़का, शूर्पनखा के बीच सीता, उर्मिला की खोज करना आसान काम नहीं। संदीप भाई तो आज लालपरी को छोड़ने को तैयार ही नहीं हैं।’’

                उसकी लफ्फेबाजी पर सभी की हँसी फूट पड़ी, लेकिन यशपाल का चेहरा तन गया। थोड़ी देर में उसने गंभीर स्वर में कहा - देखो, अब मजाक बंद। इसबार वेलेंटाइन डे पर हमें कामदेव और वामदेव दोनों का मुण्डन तेज अस्तूरे से करना है। गौतम ऋषि के साथ उसके मार्क्सवादी गाइड प्रो० सत्यकाम की फ्रेंचकट धवल दाढ़ी भी लड़कियों को बहुत लुभाती है। ठक्कर बाबा हॉस्टल के छात्रों और वीमेंस स्टडीज सेंटर की लड़कियों के असली वैलेंटाइन तो वही हैं। उन्हीं के कारण यह यूनिवर्सिटी बेलगाम छात्र-छात्राओं का गढ़ बनता जा रहा है। इन दिनों छात्राओं के जेंडर मुहिम में वे आग में लगातार घी डालने का काम कर रहे हैं। शोधछात्रा रजनी कर्मकार और कल्पना प्रियदर्शिनी का मामला एक बार फिर कब्र से बाहर आ गया है। प्रो० झा उस दिन कह रहे थे कि मीनल एण्ड ग्रूप इन दिनों विश्वविद्यालय के कई नामचीन प्राध्यापकों के इतिहास भूगोल को खंगालने में जुटी हैं। सेक्सुअल ह्रासमेंट कमिटी में कई अप्लीकेशन पड़ चुके हैं, और यह सब प्रो० सत्यकाम और गौतम ऋषि के साथ मिलकर किया जा रहा है। बुढ़ापे में भी इश्कमिजाजी बरकरार है प्रो० की। बरर्खुदार, लड़कियों के कंधे पर हाथ रखकर बातें करते हुए उन्हें इंकलाब की राह पर चलने का पैगाम देते हैं। खून खौल जाता है जब भी उन्हें इस रूप में देखता हूँ। कुलपति मंत्रालय से हमें इंडिकेशन मिल चुका है। इंटरनेशनल वाम सेंटरको इसबार पूरी तरह लॉक कर देना है हमें।

                सबने एक स्वर में कहा - एग्रीडऔर सबके हाथ एकसाथ मुट्ठियों की शक्ल में ऊपर तन गये।

                                                                                                X X X X  

                                जेंडर इक्युलिटी के आतंक से थर्राये हुए विश्वविद्यालय में कल दोपहर जो दृश्य देखा गया, वह कभी नहीं देखा गया था। परिसर में घटित हुई अनहोनी से पटे थे आज के सारे अखबार। मीडिया चैनलों पर चीख-चीख कर घटनाओं की अटकलें जारी थीं। पूरा विश्वविद्यालय परिसर पुलिस की छावनी में तब्दील हो चुका था। उधर कुलपति आवास पर पदाधिकारियों की एक आपातकालीन बैठक चल रही थी, जिसमें विश्वविद्यालय के अधिकारियों के साथ सभी हॉस्टल के वार्डन और छात्र संकाय के डीन भी उपस्थित थे।

                किसे पता था कल वेलेंटाइन डे के विरोध में निकाला गया संस्कृति रथशहर की मुनादी करता हुआ विश्वविद्यालय परिसर में आ जायेगा और धरने पर बैठी छात्राएँ उससे भिड़ जायेंगी। शहर ने पहली बार रंग-विरंगे रेशमी पर्दों एवं फूल मालाओं से सजे ऐसे संस्कृति रथको देखा था, जिसके पीछे पीत परिधान पहने, धनुष-वाण ताने सैकड़ों की संख्याँ में नौजवान और कई उम्रदराज लोग चल रहे थे। पहली नज़र में लोगों को लगा - यह कोई साधु-सन्यासियों का धार्मिक जत्था है, परन्तु रेशमी ज़ीन एवं रंग बिरंगी कौड़ियों की माला से सुसज्जित मजबूत पुट्ठों वाले अश्वों से जुते खूबसूरत रथ के दोनों ओर लहराते उजले साटन के पर्दों पर अंकित शब्दों और हाथों में लिए पोस्टरों बैनरों को देखकर लोगों को वेलेंटाइन डे का प्रतिरोध मार्च समझ में आ गया। बहुतों के हाथों में तख्तियाँ थीं जिसपर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था - हम राम के वंशज हैं/मर्यादा के रक्षक हैं।               किसी तख्ती पर लिखा था - हम आर्यपुत्र/आर्यावर्त्त की धरती पर/भारतीय संस्कृति का परचम लहरायेंगे/राष्ट्रधर्म निभायेंगे।

                कुछ रेशमी पर्दों पर काव्यात्मक पंक्तियाँ भी अंकित थीं, जिसे देखते-पढ़ते लोग हर्षित और उल्लासित हो रहे थे। लिखा था-तुम भारत की बेटी/मधुमय देश की संस्कृति हो/तुम्हारी देह वेद की ऋचाएँ हैं/इसे कबीर की चादर की तरह जतन से ओढ़ो।

                रथ के पीछे की उजली रेशमी दीवार पर भी नैतिकता का पाठ पढ़ाती कुछ पंक्तियाँ दर्ज थीं - सुनो ! भारत की बेटियों/हम आगाह कर रहे हैं तुम्हें/नारों संकल्पों के साथ/जुलुस में अपनी चुन्नी उतारकर/माथे पर साफा बाँधने का/दुःसाहस मत करो तुम/तुम्हारा पावन रूप गंगा की निर्मल धारा है/तट रहित सागर हो जाने की आतुरता/मत दिखाओ तुम।

                नीचे मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था-वेलेंटाइन डे इज नॉट आवर कल्चर।

                नारे लिखी हुई इन तख्तियों पर सबकी निगाहें टिक जा रही थीं।

                शंख-घड़ियाल की ध्वनियों के साथ संस्कृति रथ का जत्था पूरे शहर की मुनादी करता बहुत अनुशासित ढ़ंग से चल रहा था, इसलिए शहर के कोतवाल भी निश्चिंत थे। लेकिन रथ के झंकृत पहिये से चौक-चौराहे, होटल, पार्कों में एक अदृश्य दहशत जरूर व्याप्त हो गई थी। कई युगल जोड़ियाँ एक दूसरे की ओर पीठ करके विपरीत दिशा की ओर मुड़ गई थीं। सजे हुए होटल और रेस्तराओं के टेबुल पर उदासी पसर गई थी। हाँ, शहर की सड़कें फागुनी दोपहर में आर्यपुत्रों के पदचाप से गुलजार जरूर दिख रही थी।

                तभी न जाने क्या हुआ, संस्कृति रथ के पहिए के नीचे वसंतराग गाता मौसम अनायास कुचल कर क्षत-विक्षत हो गया। विश्वविद्यालय प्रांगण में क्रूरता और दरिंदगी का वह एक अप्रत्याशित दृश्य था जिसे देखने वाले देखकर खामोशी की एक अदृश्य सुरंग में समा गये थे। पूरा परिसर फागुनी मौसम में गुलाल की जगह इंसानी खून से लाल हो गया था।

                                                                                X X X X

               

                कुलपति डॉ० बी० के० आनंद के चेहरे पर आवेग और चिंता की लकीरें स्पष्ट दिखाई दे रही थीं। वे बार-बार अपने अधिकारियों और हॉस्टल के वार्डनों से एक ही बात कह रहे थे - ‘‘आप सब मिलकर तय कीजिए, हाउ टू फेस द सिचुएशन। हमें मीडिया को जबाब देना ही होगा। विश्वविद्यालय के भीतर आये उन असमाजिक तत्वों की पहचान भी करनी होगी। सभी हॉस्टल के वार्डन अपनी जिम्मेदारी सुनिश्चत करें।’’

                फिर अपने चारो ओर देखते हुए उन्होंने पूछा - ‘‘ठक्कर बाबा हॉस्टल के सुपरिटेन्डेन्ट डॉ० अंसारी इस मिटिंग में क्यों नहीं आये हैं ? कहाँ हैं वे ?’’

                कुलपति के प्रश्न पर विश्वविद्यालय के नॉडल ऑफिसर प्रो० प्रशांत ने बताया - ‘‘प्रो० अंसारी गाँव गये हैं सर ! उनके पिताजी दो दिन पहले बेहोश होकर बाथरूम में गिर गये थे - शायद हार्ट अटैक का दौरा था। कल वे गुजर गये।’’

                कुलपति की भँवें तन गईं - ‘‘ठक्कर बाबा हॉस्टल के जिन छात्रों को पुलिस ने हिरासत में लिया है, क्या उसमें दलित छात्र नेता गौतम ऋषि भी है ?’’

                ‘‘नहीं सर वह तो अभी आई० सी० यू० में है। उसके सिर में हॉकी स्टीक से गंभीर चोट लगी है। आज सी० टी० स्कैन होगा। उसकी बेहोशी खतरनाक बताई जा रही है।’’

                ‘‘वह तो स्वयं जन्मजात खतरनाक है। बेहोशी में भी होश में ही होगा।’’

                कुलपति के बोल में एक कड़वाहट भरी खीज थी। अचानक वे आवेग में खड़े हो गये और विकास

पदाधिकारी को इंगित करते हुए कहा - ‘‘प्रो० चतुर्वेदी आप अभी इस्लामपुर थाने के इंचार्ज से बात कीजिए। विधायकजी का फोन आया था। वारदातों के पीछे किन लोगों को नामजद बनाया गया है - उसकी सही जानकारी उन्हें चाहिए।

                कुछ ठहर कर उन्होंने फिर कहा - ‘‘आपने कहा था प्रो० तरुण कुमार डी० एस० पी० कुणाल के बैचमेट हैं। आखिर उनकी दोस्ती किस दिन काम आयेगी। उनसे बात की है आपने ?’’

                ‘‘सर ! वे डी० एस० पी० के आवास पर ही गये हैं अभी। कुछ देर पहले वहीं से उन्होंने मुझे फोन किया था। वहाँँ से वे इधर ही आयेंगे।’’

                प्रो० चतुर्वेदी की बातों से कुलपति के चहरे का तनाव कुछ कम हुआ।

                उनकी जिज्ञासा फिर आगे बढ़ी  - ‘‘सुना है प्रोफेसर सत्यकाम के चेम्बर में भी शहरी शोहदे घुस गये थे ? उनके साथ भी कुछ मिसविहेब हुआ है क्या ?’’

                छात्र संकाय के डीन प्रो० विनोद झा ने इस प्रश्न पर लपकते हुए कहा - ‘‘प्रो० सत्यकाम अपने चेम्बर में कहाँ थे सर ! वे तो छात्राओं के बचाव में हीरो बनकर कूद पड़े थे। उसी दरमियान उन्हें भी दो-चार पड़े हैं। रंगीन बुढ़ापे का तोहफा आखिर ऐसा ही तो मिलेगा न।’’

                प्रो० झा की इस टिप्पणी पर कई चेहरों पर मुस्कान की रेखा खींच गई।

                देश के जाने-माने इतिहास अध्येताओं में प्रो० सत्यकाम की गिनती है, परन्तु अपने विश्वविद्यालय में अपनी वैचारिक निष्ठा और प्रतिबद्धता के कारण न केवल प्राध्यापकों बल्कि कुलपति से भी उनकी हमेशा एक दूरी बनी रहती है। कुलपति उन्हें आत्ममुग्ध प्राणी कहते हैं, परन्तु आज उस प्राणी की दुर्गति पर वे खुश होकर भी कहीं न कहीं से आतंकित थे।

                इसी बीच प्रो० तरुण कुमार ने कमरे में पैर रखा और सबकी नजरें उनकी ओर उठ गईं। कुलपति की जिज्ञासा भरी आँखों को अपनी नजरों से आश्वस्त करते हुए प्रो० तरुण इत्मीनान से सोफे पर उनकी बगल में बैठ गये। कुलपति ने सिर्फ एक वाक्य में पूछा - ‘‘बात हो पाई ?’’

                जी सर !

                चाय पीते हुए उनके बीच मौन का संवाद चलता रहा।

                चुप्पी के उस अंतराल को भांप कर कुछ पदाधिकारी कुलपति से इजाजत लेकर जाने के लिए उठ गये। उन्हें लगा कमरे में पसरी खामोशी को भरने के लिए उनका जाना जरूरी है। मीटिंग के दूसरे दौर में कुलपति  के साथ कुलसचिव प्रो० भरत शर्मा, विकास पदाधिकारी प्रो० चतुर्वेदी, प्रो० तरुण कुमार एवं छात्र संकाय के डीन प्रो० विनोद झा ही रूके थे, जो इस कठिन समय में संस्थान के पक्ष की आवाज बन सकते थे।

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                और फिर हिंसक समय का वह अमानवीय दृश्य सत्ता और व्यवस्था के समूहबद्ध प्रयत्नों से अचानक बदल गया था। टी० वी० चैनलों पर सनसनीखेज खबरों का सिलसिला भी थम गया था। नगर विधायक के भांजा संदीप और उसके मित्र यशपाल का नाम कुछ क्षण के लिए हवा की फुसफुसाहट में घुलकर कई कानों तक पहुँचा लेकिन तत्क्षण ही प्रभुवर्ग के अट्ठास में एकाकार होकर डीलिट हो गया। नगर थाने में जिन लड़कियों ने अपनी आप बीती बताई थी वह बेमानी था। छात्राओं के साथ धक्का मुक्की, दुपट्टा खींचने, कपड़ा फाड़ने जैसे सारे आरोप अज्ञात मुखौटाधारियों के विरुद्ध दर्ज थे, इसलिए कोई चार्जसीट दाखिल नहीं किया गया। बिना नाम पते और चेहरे का गवाह भला कौन बनता ?

                आग बुझने के बाद काले धुँए का जिक्र अगर फिजा़ओं में था भी तो, उसकी प्रमाणिकता सिद्ध करने वाले छात्र जीवन मृत्यु से जुझ रहे थे। अस्पताल के आई० सी० यू० में हॉकी स्टीक से लहूलुहान गौतम ऋषि और एसिड अटैक से घायल मीनल अवस्थी का बयान पुलिस नहीं ले पाई थी, क्योंकि डॉक्टरों ने इसकी इजाजत नहीं दी थी।

                लड़कियों का हॉस्टल खाली कराया जा चुका था। मीनल के साथ जेंडर इक्युलिटी की मुहिम से जुड़ी लड़कियों को उनके अभिभावक देश-दुनिया, समय-समाज की अनेक अर्थछवियों को दिखा समझा कर अपने साथ वापस घर ले जा चुके थे।

                प्रो० सत्यकाम सत्ता और संस्था की दुरभिसंधि को खुली आँखों से देख रहे थे और शिक्षा के राजनीतिक और सांस्कृतिक एजेंडे पर लगातार अपनी वैचारिक उर्जा खर्च कर रहे थे। हस्तक्षेपमें आज भी उनका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और लोकतंत्रपर एक बड़ा आलेख प्रकाशित हुआ था, जो परिसर के अभेद्य सन्नाटे में एक थ्रिल पैदा कर गया था। यह जानते हुए भी कि उनके ऐसे विचारों से उनके गुरूकुल को ध्वजावाहक सेनानियों द्वारा फिर रौंदा जा सकता है - वे चुप नहीं रह सकते थे। उनकी आँखों के अक्स में लहूलुहान गौतम और मीनल का चेहरा हर समय तैरता रहता था। आखिर इन बच्चों का कसूर क्या है ? यही न कि शिक्षा को वे सामाजिक परिवर्तन का एक हथियार मानते हैं। पथरीली जमीन पर विचारों के अग्निबीज गोड़ते हैं। व्यवस्था से सवाल पूछते हैं। क्या मानसिक उपनिवेशवाद के विरुद्ध एक जागरूक दृष्टि रखना अपराध है ?   

                उन्हें याद आया मीनल ने उसदिन उनकी पत्नी संस्कृतिके नाम को लेकर उनके आवास पर एक बहस छेड़ दी थी - ‘‘सर ! आपके घर में स्त्री संस्कृतिके रूप में क्यों परिभाषित है ? क्या मैम के इस नाम को पुकारने में आपको असुविधा नहीं होती ?

                हम सब हँस पड़े थे। फिर कितनी देर संस्कृति और स्त्री पर हमने बहस की थी। उसने उस दिन संस्कृति मैम का नाम कृति रखकर नामकरण का जश्न मनाते हुए सबको अपने हाथ का बना हलुआ खिलाया था और मेरी ओर तर्जनी तानकर हँसते हुए कहा था - सर ! भारतीय समाज जड़ संस्कृति से नहीं, हठीली और गर्वीली स्त्री से बदलेगा। 

                आह ! आज समाज बदलने वाली वह लड़की संस्कृति के नाम पर ही झुलस डाली गई ---

                प्रो० सत्यकाम तड़प उठे थे।

                ये बच्चे जो अपने ज्ञानानुशासन से प्रचलित मान्यताओं से आगे भी कोई सच ढ़ूढ़ना चाहते हैं - अकादमिक गलियारों को अपने विचार विमर्श और तर्क से जीवंत बनाते हैं - हँसते हैं - खिलखिलाते हैं - उन्हें क्यों अच्छे नहीं लगते ?

                भीतर के गहन अंधकार में सुनाई देती ये आवाजें उन्हें बेचैन कर रही थीं। 

                तभी उनके चैम्बर में कुलपति कार्यालय से राजभवन द्वारा प्रेषित एक पत्र आया, जिसका संक्षेप सार शायर इस्माईल मेरठी के शब्दों में यही था -

                ‘‘धुआं है न शोला, न गर्मी, न आंच

                चमके के तेरे करुंगा मैं जांच’’

                प्रो० सत्यकाम के होठों पर करुण मुस्कान की एक रेखा खींच गई। उन्होंने मन ही मन सोचा आज इस पत्र की विरुदावली पूरे विश्वविद्यालय में गायी जायेगी - इतना तो तय है।

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नोट - शीर्षक के लिए शायर इस्माईल मेरठी (उर्दू रजिस्टर) का आभार।

                                                                                                                                संपर्क - पूनम सिंह

                                                                                                                                                चतुर्भुज ठाकुर मार्ग

                                                                                                                                                गन्नीपुर

                                                                                                                                                पो० - रमना

                                                                                                                                                मुजफ्फरपुर, बिहार।

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