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In quest of Myself by Jaya Jadwani

 

देह का गणित  

 

बहुत सीधा है देह का गणित

दो और दो कभी नहीं होते पांच

कान लगाकर सुनो तो

शीघ्र बता देता

कहाँ लोहा

कहाँ पानी

कहाँ आग

ज्वालामुखी कहाँ

सब कुछ सीधा और साफ़

जैसे धरती

न हो बारिश तो पड़ जातीं दरारें

हो कई दिनों तक लगातार

बह जाता सब कुछ निशान छोड़े बिना

न शामिल करो मन को तो

बहुत सीधा है देह का गणित

यहाँ दो और दो चार होते ही नहीं

यहाँ सम्पूर्ण हो जाता एक

अधूरे होते दो ,दो छोरों पर

हर बार फेल हो जाती है देह

इस इम्तहान में

हर बार मिलते हैं मन को ही

सबसे ज्यादा अंक जबकि

देखी नहीं कभी उसने

क्षण को भी पलटकर

किताब इस देह की ......

 

 

The Body’s Arithmetics

 

The body’s Arithmetics is quite simple

Two and two never make five

If you listen attentively

It tells at once

Whither steel

Whither fire

Whither volcano

Everything plain and clear

Like earth that cracks

If it rains not

If it rains non stop for many days

Everything is washed away

Without leaving a trace

If you leave the mind out

The body’s Arthmetics is plain

Here two plus two never add to four

Becoming rather an entire one

With two incomplete twos, at two poles

The body always fails in this test

Each time the mind

Gets the maximum marks

Though it never turned

Even for a moment

The pages

Of the body’s book.

 

 

 

 

अपनी तलाश में

मुझे नहीं पता था एक दिन

मैं अपनी तलाश में

खो दूँगी अपने को ही

खो देता है रख होकर

काग़ज़ अपना आकार

मौन होकर प्रार्थनायें

खो देती हैं शब्द अपने

धीरे धीरे रंग सारे जीवन के

बैठ जाते जल की सतह में खामोश

धुले हुये सफ़ेद चेहरे लिये

धीरे धीरे जाती खाली नाव

उस पार ....

कुहरे और धुंध से लिपटी हुई

कुहरे और धुंध की ओर .......

 

In quest of Myself

 

I didn’t know that one day

I shall lose myself

In my own quest

A piece of paper turning to cinders

Loses its shape

Prayers become mute

And lose their words

All the life’s hues gradually

Sink silently to the depth of water

The slow sailing boat

Carring faces washed white

To the other shore

Dranched in fog and mist

Sailing towards fog and mist ……

 

 

 

अभिव्यक्ति

 

लेकर नक्षत्र हाथों में

बजाऊँ मैं करताल की तरह

जिसकी धुन पर नाचे पूरी पृथ्वी

पूरा आसमान

समूची आकाशगंगायें

कि बरसे जल समस्त धाराओं में

प्रेम को कैसे व्यक्त कर सकती हूँ

मैं

इसके सिवाय ........

 

 

Expression

 

 

Taking the star in my hands

I’ll play it like a cymbal

On whose tune will dance The whole earth

The full sky

Entire galaxies

So that it may rain in streams

How else can I

Express love.

 

 

वे 

 

वे मेरी कलम पर चढ़ कर बैठ गए और

वह-वह लिखवाया जो वे चाहते थे

सबसे पहले उन्होंने पढ़ाया पाठ

देह का

और तरीके समझाए वही

जिससे थे वे ही अवगत

फिर समझाई रिश्तों की परिभाषा

देह जिससे जुड़ी अनिवार्यतः

फिर बताया भूखों की किस्मों के बारे में

उन्हें मिटाने के उन उपायों को

जिन्हें वे ही आजमाते थे

ले गए मुझे पशुओं के बाड़े में

दिखाया पलते-कटते-पकते-खाते और खिलाते

और समझाए नियम

सिखाई तरकीब

रटवा दिए सारे शास्त्र और परिभाषाएं मुहरबंद

उन्होंने सिखाए परिवार चलाने के तरीके

संसार चलाने के रखे खुद तक महफ़ूज़

उन्होंने यात्राएं कीं हमारे जिस्मों की

रौंदा ..... रौंदा ...... और रौंदा ....

जब नहीं पहुँच पाए वहां, कहा

सुरंग तेरी आत्मा की किस चाबी से खुलती है

मुझे हंसी आ गई

तब से दोस्तों मैं हँसे जा रही हूँ

क्या आपको मेरा रोना सुनाई दे रहा है?

 

They 

 

They climbed and sat upon my pen

And made me write whatever they wanted 

First they taught me the lessons of the body

And ways with which

Only they were acquainted 

Then made me understand 

The definition of relationships

To which the body 

Was essentially connected

After that they explained the types of hungers

And the means to satisfy them 

Which they alone practised

Then took me to animal's barns

And showed how they were

Reared, slaughtered, cooked, eaten and served

They explained the rules

And taught the strategies

Made me parrot all the Concepts and definitions

Sealed

Taught me devices of running the family 

But kept to themselves 

The ways of running the world

Secure

They made voyages of our bodies 

Which they 

Crushed... and crushed... and crushed... 

More and more and more

When they failed to reach there, asked

What key opens the tunnel of your soul

I fell a-laughing

Since then friends 

I have been laughing incessantly

Can you hear the sound of my wails?

 

 

woman -1 

जो कभी नहीं बोलते

 

जो कभी नहीं बोलते

बोलते हैं सबसे ज़्यादा

जिसे तुम ख़ामोशी समझने की भूल करते हो

वह जगह पटी पड़ी है

शब्दों की लाशों से.

 

Those who speak not

 

Those who speak not

Speak more than all  

Which you think to be silence 

That space is occupied     

By corpses of words.

 

 

2.

वे हर बार छोड़ आतीं हैं

अपना चेहरा

उनके बिस्तर पर

सारा दिन बिताती हैं

जिसे ढूढने में

रात खो आतीं हैं .

 

 

Each time they  

Leave their faces

On the beds of their men

The whole day is spend

In quest of that

Which they squandere at night.  

 

 

3.

पढ़ते हैं खुद

खुद नतीजे निकलाते हैं

मेरी दीवारों पर क्या कुछ

लिख गए लोग .

 

 

Themselves they read

 Themselves conclude

What have the people

Etched on my walls.  

 

  

4.

जैसे हाशिये पर लिख देते हैं

बहुत फालतू शब्द और

कभी नहीं पढ़ते उन्हें

ऐसे ही वह लिखी गयी और

पढी नहीं गयी कभी

जबकि उसी से शुरू हुयी थी

पूरी एक किताब .

 

Just as written at the marjin

Useless words and

Not to be read again

Thus she is written and yet

Never read

Were as started from her

A complete book.

 

5. 

वह पलटती है रोटी तवे पर

और बदल जाती है पूरी की पूरी दुनिया

खडी रहती है वहीँ की वहीँ

स्त्री

तमाम रोटियां सिंक जाने के बाद भी .

 

 

She turns the chapatti on Tawa

And whole world changes

Stands on the same spot

A woman

After making all the chapaties.

 

6.

तहखानों में तहखाने

सुरंगों में सुरंगें

ये देह भी अजब ताबूत है

ढूंढ लेती हूँ जब ऊपर आने के रास्ते

ये फिर वापस खींच लेती है .

 

Dungeons within dungeons

Tunnels within tunnels

This body is a weird tomb

When I find a way out

It pulls me back again.

 

7.

 

एक घोंसला

सांस पर अटका

सांस खिंची

डाल नंगी हो गई.

 

A nest

Stuck on the breath

I drew the breath

The branch become bare.

 

 

 

 

  8. 

 Only one poem

 

So much thinner stripes were inside

In so for as were invisible

On atmost blank paper

I write a entire life

Only one poem

Abundant than conscious existence.

 

मैं रात के दस मिनट की मलिका हूँ

जब तुम गिडगिडाते हो मेरे सामने

और मैं दया करती हूँ तुम पर

यह दस मिनट का जुगनू

सुबह तक मर जाता है मेरी मुट्ठी में

मेरे घर के पिछवाड़े

मरे हुए जुगनुओं की लाशें हैं.

 

देह स्वप्न

ले गया कपड़े सब मेरे

दूर.....बहुत दूर

काल बहती नदी में

मैं निर्वसना

तट पर

स्वप्न देखती देह का.

 

Time, in the flowing river

Took away all my clothes

Far … very far …

On the coast

I bare   

Seeing dreams of body.

 

       Jaya Jadwani / Raipur 

 

 

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