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सतपुड़ा के जंगलों में - सुरेश ऋतुपर्ण



कहने को तो सारा जीवन ही एक यात्रा है लेकिन इस यात्रा के प्रवाह में जो अन्य अनेक यात्राएं घटित होती रहती हैं उनकी स्मृतियां जीवन को आनंदमयी सार्थकता देती हैं। मैं घुम्मक्कड़ प्रकृति का हूं लेकिन उन अनुभवों को लिखने से कतराता रहता हूं। क्योंकि कई बार लगता है कि इन अनुभवों में क्या कुछ ऐसा विशेष है कि औरों से साझा किया जाए? जब यह सोचने लगा तो अचानक पंचमढ़ी की एक यात्रा की स्मृति उभर आई जिसमें कुछ ऐसा विलक्षण घट गया था जिसकी याद आज भी चमत्कृत कर देती है। ऐसी ही एक यात्रा थी सतपुड़ा के जंगलों से घिरी पचमढ़ी की।

     संभवतः सन् 1986 के आसपास की बात होगी। मैं हिन्दू काॅलेज में प्राध्यापक था और आधुनिक हिन्दी कविता के विशिष्ट संदर्भ में नयी कविता पढ़ाया करता था। एक दिन कक्षा में भवानी प्रसाद मिश्र की कविता सतपुड़ा के जंगलपर चर्चा चल रही थी कि एक छात्र ने पूछा--सर, ये सतपुड़ा के जंगलकहां हैं? मैंने बताया कि मध्यप्रदेश की गर्मियों की राजधानी पचमढ़ीसतपुड़ा के जंगलों से घिरी है। कुछ छात्रों में खुसर-पुसर सी हुई और एक छात्र ने खड़े होकर कहा--सर, क्या हम लोग पचमढ़ीकी यात्रा का कार्यक्रम बना सकते हैं। सारी कक्षा एकदम प्रसन्न होकर चहचहाने लगी। मैं चुपचाप उन्हें सुनता और देखता रहा कि यात्रा के प्रसंग मात्र से ये लोग कितने प्रसन्न हैं। जब यात्रा पर जायेंगे तो क्या होगा? मैंने कहा-अरे पहले कविता पर हो रही चर्चा तो समाप्त कर लें। लेकिन पूरी कक्षा के पर निकल आये थे। उड़ने को तैयार। मुझे भी किताब बंद कर देनी पड़ी। सभी को बारी-बारी से बोलने की आजादी दे दी।

एक छात्र थे वीरेन्द्र खन्ना जिन्होंने रेल यात्रा तथा आवास की व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाने की बात कही। किसी भी यात्रा में ये दो तत्व ही सबसे प्रधान होते हैं। मैंने कहा - हम अपने सहयोगी प्राध्यापक डाॅ. हरीश नवल जी से भी चर्चा कर लेते है। प्रधानाचार्य महोदय से भी तो आज्ञा लेनी होगी। तभी अचानक काॅरीडोर में हरीश नवल दिखाई दिए। हमारी एक छात्रा उन्हें भी बुला लाई।

हरीश जी हमारे सदाबहार साथी थे। उनके आते ही कक्षा का तापमान बढ़ गया और सभी के तर्काें के सामने हथियार डालते हुए हमने यात्रा के लिए अपनी सहमति प्रदान कर दी।

छात्रों की एक उत्साही टीम ने रेलवे बुकिंग और पचमढ़ी के सर्किट हाउस में आरक्षण की कार्यवाही शुरू कर दी। दूसरी टीम ने छात्रों हेतु रियायती पास बनवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी। मैंने और हरीश नवल ने प्रधानाचार्य महोदय से बात करके क्रिसमस के अवकाश में यात्रा पर निकलने की अनुमति भी ले ली।

सभी छात्र-छात्राओं का उत्साह आसमान छू रहा था। लगभग प्रत्येक दिन यात्रा की तैयारियों पर ही चर्चा होती रहती थी।

 

 

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बहरहाल, जिस दिन हमें यात्रा पर जाना था, मैं अपने घर के पुस्तकालय में दूसरा सप्तककी प्रति खोजता रहा पर वह नहीं मिली। संभवतः किसी को उधार दे रखी थी। मन में था कि पचमढ़ीमें किसी शाम सतपुड़ा के जंगलके साथ ही साथ सन्नाटा’, ’गीत फरोशजैसी कविताओं का वाचन किया जायेगा। जिस परिवेश का चित्रण सतपुड़ा के जंगल में है उसे पास से महसूस किया जायेगा, देखा-समझा जायेगा। बहरहाल हमारा पूरा समूह यात्रा पर निकल पड़ा। होशंगाबाद होते हुए हम लोग पचमढ़ी पहुंच गये। वहां के सर्किट हाउस में सभी लोगों की रहने की व्यवस्था थी।

     इस यात्रा में हमारे साथी डाॅ. हरीश नवल भी थे सपरिवार। आज की प्रसिद्ध गायिका रेखा विशाल भारद्वाज भी थी जो उन दिनों हिन्दू काॅलेज की छात्रा थी। कई दिनों तक हम लोग सतपुड़ा के जंगलों में घूमते रहे और प्रकृति का आनंद उठाते रहे। लौटने से एक दिन पहले तय हुआ कि धूप-गढ़ीपर जाकर सूर्यास्त देखेंगे और फिर डिनर के बाद कैम्प फायर होगा।

     धूप-गढ़ी तक जाने के लिए हमने चार जोंगा गाड़ी तय कर लीं। बड़ी खड़ी चढ़ाई थी।  जोंगा के साथ एक सहायक दो ईटों को लेकर जोंगा के पीछे के प्लेटफार्म पर खड़ा होकर चलता था क्योंकि कहीं-कहीं चढ़ाई इतनी खड़ी होती थी कि गाड़ी पीछे लौटने लगती थी। वह एकदम उतर कर पहियों में ईंटे लगा देता था। दो-तीन लोग उतर जाते थे और तब जोंगा आगे बढ़ती थी। बहरहाल, सब लोग धूपगढ़ी पर पहुंच जाते हैं और सूर्यास्त का नयनाभिराम दृृश्य देखते हैं और अभिभूत होते हैं।

     इसके बाद  शुरू होती है वापस लौटने की प्रक्रिया। ये जोंगा वाले बड़े चालाक होते हैं। इन लोगों ने हमसे पहले भी कई चक्कर लगा कर बहुत से लोगों  को धीरे-धीरे उपर पहुंचा रखा था। उसी क्रम से उन्होंने लौटना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे अंधेरा घिरने लगा और ठण्ड बढ़ने लगी। जैेसे ही तीसरे चक्कर में हम लोगों का नम्बर आया तो मैंने अपनी सभी छात्राओं को डाॅ. हरीश नवल और अपने परिवार के साथ वापस भेज दिया। हम एक जोंगा में आ जाने वाले छात्रों का समूह पीछे रह गया। केवल अब हम ही वहां बचे थे। उस उंचाई पर ठण्ड बढ़ने लगी। जोंगा आने का नाम ही नहीं ले रहा था। पास में ही एक बूढ़े बाबा की गुमटी थी। वहां अलाव जल रहा था। हम सभी लोग वहां जाकर बैठ गये। तभी जोंगा के आने की आवाज सुनाई दी। हम लोग बाहर निकल आए।

     जोंगा के ड्राईवर को सभी भला बुरा कहने लगे। वह बोला-मेरी गाड़ी में गड़बड़ हो गयी है। इंजन गर्म हो जाता है और लाइट भी नहीं जल रही है। हमारा गुस्सा अब एक डर में परिवर्तित हो गया कि हम लोग नीचे कैसे जायेंगे? पैदल जा नहीं सकते थे। सारा रास्ता जंगल और जंगली जानवरों से भरा था। पहाड़ी पर ठण्ड की रात कैसे गुजारेंगे। वे दिन मोबाइल फोन के नहीं थे कि कहीं से मदद की गुहार लगाई जा सके।

 

 

 

 

 

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     कुछ समय के विश्राम के बाद ड्राईवर बोला--गाड़ी ठण्डी हो गयी है। अब हम चल सकते हैं। उतराई है। पहुंच जायेंगे। हम सब जोंगा में बैठ गये। हमारे पास दो टार्च थीं। जोंगा के दोनांे किनारों पर बैठ कर हमारे दो छात्र लाइट फेंकते रहे और जोंगा धीरे-धीरे नीचे  उतरने लगा। उतराई थी, अतः जोंगा को ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। हमारे लोग पहाड़ी पर बैठे फिल्मी गीत गाकर समय गुजार रहे थे। अब भगवान का नाम लेकर कीर्तन कर रहे थे। 10-15 मिनट की यात्रा के बाद हम लोग पहाड़ी से नीचे आ गये। सभी छात्र लोग खुशी से चिल्लाने लगे। जान बची और लाखों पाये जैसा भाव था।

 

     आज हमारी यात्रा का पचमढ़ी में आखिरी दिन था। जब नीचे उतर आए तो एक तिराहा आया। जिसके दायीं ओर सर्किट हाउस का रास्ता जाता था और बायीं ओर बाजार का। हमारे ग्रुप लीडर छात्र ने सुझाव दिया कि-’’सर ! कैम्प फायर के समय खाने के लिए मूंगफली और रेबड़िया  बाजार से खरीद लेते हैं। सर्किट हाउस से दोबारा यहां आना मुश्किल होगा।’’ मुझे यह सुझाव अच्छा लगा और हम लोगों ने जोंगा वाले को बाजार ले जाने के लिए कहा। एक बेहद छोटा सा बाजार था। जैसा कि अमूमन पहाड़ी प्रदेशों में होता है। पता लगा कि सामने ढकेल पर जो आदमी खड़ा है, उसी से मूंगफली और रेबड़ी मिल सकेगी। पता करने पर उसने बताया कि वह तो ताजी-ताजी मंूगफली भूनता है। थोड़ा इन्तजार करना होगा। मैं जल्दी-जल्दी आग तेज करता हूं। आप कुछ देर के लिए इन्तजार करें।

     हमारे पास कोई चारा नहीं था। अन्य छात्र भी इधर-उधर से कुछ खरीद कर खाने-पीने लगे थे। मैं भी एक दुकान के पटरे पर जाकर बैठ गया और उससे बोला--हमें बढ़िया चिरोंजी और असली शहद मिल सकता हो तो दीजिए। मेरे पिताजी ने मुझे बताया था कि पचमढ़ी में चिरोंजी बहुत पैदा होती है और बड़े साइज की होती है। दुकानदार ने अपने नौकर से कहा कि हमें चिरोंजी और शहद लाकर दिखाए

     तभी एक बच्चा 8-10 साल का, कोई सामान लेने आया तो दुकानदार ने रद््दी की किताब से एक पन्ना फाड़ा और उसमें वह समान बांधने लगा। मैंने देखा वह एक ऐसा पृष्ठ  था जिस पर कोई कविता छपी हुई थी। मेरा कवि मन जाग्रत हो गया। मैंने दुकानदार से कहा - अरे भाई! ये कागज मुझे दे दो। तुम दूसरा फाड़ लेना। उसने मेरी ओर देखा और वह कागज मुझे दे दिया।

     जब मैंने वह कागज लेकर पढ़ना शुरू किया तो मेरे मुंह से बेसाख्ता निकला- अरे! वाह!  कमाल हो गया। आपको बताऊं  वह कविता भवानी प्रसाद मिश्र की -सतपुड़ा के जंगलथी। जिस किताब से उसे फाड़ा जा रहा था, वह एन.सी.आर.टी की हिन्दी पाठ्य- पुस्तक थी। मैंने दुकानदार से दूसरा पृष्ठ भी ले लिया और सोचा कि सर्किट हाउस पहुंच़ कर सबको यह अद्भुत संयोग बताऊंगा। अब तक हम यह भूल ही गये थे कि हमें जल्दी से सर्किट हाउस जाना चाहिए था। मैं चिरोंजी और शहद लेकर मूंगफली वाले के पास आया और पैक करने के लिए कहा। सभी छात्रों को चलने के लिए पुकारा। तभी क्या देखता हूं कि एक जोंगा मेरे पास आकर रूकी और डाॅ. हरीश नवल ने गुस्से में आकर मुझको पकड़ कर झिझोड़ डाला। बोले- मन कर रहा है कि तुम्हारी जम कर पिटाई करूं

 

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     मैं हक्का-बक्का उन्हें देखने लगा। माजरा समझ ही नहीं आ रहा था। तब उन्होंने बताया कि सभी जोंगाओं के अलावा सिर्फ हमारी जोंगा ही नहीं लौटी थी। उन डाइवरों ने बताया था कि जो जोंगा आपको लेने गयी है उसमें खराबी आ गयी है । अतः सर देर से लौटेंगे। अब तो दो घंटे से ज्यादा हो गये है तो सभी को चिन्ता होने लगी। लगा कि अवश्य ही जोंगा दुर्घटनाग्रस्त हो गयी होगी। हमने सर्किट हाउस के मैनेजर से पूछा कि कैसे पता किया जा सकता है तो उसने पुलिस को फोन कर दिया। पुलिस पहुंची तो उन्होंने कहा कि सर्च लाइट लेकर उस रास्ते पर निकलना होगा। रस्से भी लेकर जाने होंगे। हम तैयारी करते हैं और आप एक बार बाजार की ओर जाकर भी देख आएं।

     सारी स्थिति साफ हो गयी। मेरा सिर अपराधबोध से झुक गया। हम पहाड़ी से नीचे उतर कर उत्साह में यह भूल ही गये थे कि सब लोग सर्किट हाउस में हमारा इन्तजार कर रहे होंगे। हरीश ने बताया कि सभी लोग बैठे परेशान है और रो रहे हैं। मेरी पत्नी और बेटियांँ गुम-सुम हैं। तुम्हें पहले सर्किट हाउस आना चाहिए था। मैं चुपचाप सुनता रहा। मुझे अपनी भयंकर भूल समझ में आ रही थी। लेकिन कभी कभी अति उत्साह में हम आगे आने वाली स्थिति की कल्पना ही नहीं कर पाते हैं।

 

     सर्किट हाउस पहुंचे तो सभी लोग खुशी में रोने लगे। लगा जैसे हम मौत के मुंह से बच कर आये हैं। हरीश ने एकदम ये नहीं बताया कि हम बाजार में थे। यह कहा कि जोंगा देर से पहंुची । अंधेरे में बिना लाइट के कारण उतरने में बहुत समय लगा।

     मेरे मन का सारा उत्साह गायब था। सतपुड़ा के जंगलकविता के अप्रत्याशित रूप से मिलने की खुशी बताता भी तो कैसे? सभी ने डिनर की तैयारी शुरू करायी। कैम्प फायर करने का विचार त्याग दिया गया और खाना खाने के बाद सभी लोग सर्किट हाउस के बड़े मीटिंग रूम में इकट्ठे हो गये।  अब तक अवसाद के बादल छंट गये थे। युवा मनों का उत्साह जाग गया था। सभी लोग गीत सुनने-सुनाने लगे। सभी ने रेखा से कई गीत और ग़ज़लें सुनीं।

     अंत में मुझसे अपनी  कोई कविता सुनाने के लिए कहा गया तो मैंने जेब से वह फटा कागज निकाला और ’’सतपुड़ा के जंगलकविता का पाठ शुरू किया। कविता को सभी ने सराहा और एक छात्र ने कहा- ’’सर! आपने तो बताया था कि कविता की पुस्तक नहीं मिली है।’’ तब मैंने कविता मिलने की पूरी कहानी सुना दी। सभी लोग तालियां बजाने लगे। अब जब कभी भवानी प्रसाद मिश्र जी का नाम सुनता या पढ़ता हूं तो अनायास ही ’’सतपुड़ा के जंगल’’ कविता के मिलने की यह कहानी मानस पटल पर चलचित्र की मानिंद दिखाई देने लगती है। ऐसी थी हमारी पचमढ़ी की यात्रा।

 

पता: 221, प्रभावी अपार्टमैंट्स, सेक्टर-10,

प्लाट नं. 29 बी, द्वारका, नई दिल्ली

 

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