निराला की ये पंक्तियों उपन्यास ‘कालचिती’ की इस इबारत” अब पहले जैसा कुछ नहीं रहा...हम लोगों का सब खत्म हो रहा है जैसा” का ही पर्याय है जिसे नक्सल प्रभावी क्षेत्रों के जिये जाने वाले वर्तमान जीवन के कई संदर्भों में देखा जा सकता है किंतु अनंत और दीर्घकालिक समस्याओं के संदर्भ में ये पंक्तियाँ उतनी ही सटीक हैं जितना ‘कालचिती’ को पढते हुये उस अनुभव से गुजरना जो भयानक है। नाटक में विष्कंभक की तरह उपन्यास की प्रस्तुत पंक्तियाँ उस पूरे परिवेश का परिचय देती हैं जहाँ अप्रतिम सौंदर्य के धनी आरण्यक परिवेश में बारूद की तीखी गंध और पुलिस और नक्सली दोनों के आतंक से ग्रसित सीधे सादे आदिवासियों की चीखें गूँज रही हैं। आदिवासी अपने पर्यावरण से वंचित हो अपने ही प्रशासन के हाथों अत्याचार सहने और काल-कलवित होंने के लिए मजबूर है।उपन्यास की प्रस्तुत पंक्तियाँ उस पूरे परिवेश का परिचय देती हैं जहाँ अप्रतिम सौंदर्य के धनी आरण्यक परिवेश में बारूद की तीखी गंध और पुलिस और नक्सली दोनों के आतंक से ग्रसित सीधे सादे आदिवासियों की चीखें गूँज रही हैं।आदिवासी अपने पर्यावरण से वंचित हो अपने ही प्रशासन के हाथों अत्याचार सहने और काल-कलवित होंने के लिए मजबूर है।

पश्चिमी बंगाल के आदिवासी कल्याण विभाग के अनुसार ‘1950-60 के समय के दौरान ,मालदा पश्चिमी मिदनापुर,दर्जिलिंग ,बीरभूमि, चौबीस परगना,बांकुडा ,पुरुलिया,हुगली बदपवरल,और मिदनापुर जिलों से इन्हें भारी सँख्या में बेदखल कर दिया गया है और यह मुख्यतया आदिवासियों की भूमि गैर आदिवासियों द्वारा लेने से हुआ है ।1967 में नक्सलबाडी में भूमिपतियों के खिलाफ तीर कमान लेकर लडाई के मैदान में उतरे संथाली अपने हक के लिए लडे थे। परंतु समय बीतने पर वह आंदोलन कमजोर पड गया आज नक्सलबाडी में कोई सुगबुगाहट नहीं। कानू सान्याल ने कहा था”नक्सल आँदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक कर आतंक की राह पर चल पडा था यही इसके नाकाम रहने की वजह रही”।किंतु आतंक का पर्याय बने जिस नक्सलवाद को आज आदिवासी झेल रहे हैं वह देश के 21 राज्यों और 250 जिलों में वह जडें जमा चुका है ।2006 की आँतरिक सुरक्षा स्थिति की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि देश का 60% भाग नक्सल समस्या से ग्रस्त है ।नक्सली गिरोह माईंस लगा कर सेना,पुलिस और नेताओं के काफिलों के परखच्चे उडाने,अपहरण ,फिरौती ,डकैती, निर्ममता अवैध वसूली,बम विस्फोट, और विकास को बाधित करने वाली कार्रवाईयों में संलप्त है।यह बात दीगर है कि ये नक्सली भी उन्हीं आदिवासियों का हिस्सा हैं जो हिंसा की राह पर चलकर कुछ पाना नहीं चाहते प्रशासन के प्रति आक्रोश और केवल अपना पेट भरने की न्यूनतम जरूरत को पूरा करना चाहते हैं ।वे यह भी जानते हैं कि यह हिंसा उन्हें कहीं नहीं ले जाएगी पर क्या करें जब दोनों और स्थिति ऐसी हो कि एक तरफ कुँआ ओर दूसरी तरफ खाई तो किसी एक का चुनाव कर लेना नजबूरी हो जाता है ।उन्हें लगता है कि मरना तो है ही यों न सही यों सही।इन दोनों के बीच आम आदिवासी जो सीधे सादे ढंग से कम खाकर और गम खाकर जीना चाहता है दो पाटन के बीच पिस रहा है । नक्सलियों से कहीं ज्यादा आम आदिवासी ही भारत सरकार की सेना और पुलिस द्वारा चलाए जा रहे ग्रे हाउंड, कोबरा,ऑपरेशन ग्रीन हंट को सहने के लिए मजबूर हैं ।वे सरकार को भी बर्दाश्त्र कर रहे हैं और समांतर सत्ता को भी सहने को अभिशप्त हैं । यह दोहरा अभिशाप या अत्याचार उन्हें मजबूर कर रहा है वन से पलायन करने के लिए ।यही कारण है कि बस्तर प्रदेश में 2001 की जनगणना में आदिवासियों की जनसंख्या वृद्धि दर 9.30 थी जो 2011 में घटकर 8.6 रह गई ।

शेखर मल्लिक ने ‘कालचिती’ उपन्यास में इसी महत्वपूर्ण मुद्दे को आम आदिवासी जन की निगाह से उठाया है।उपन्यास के रूप में यह पुस्तक उसी तरह तथ्यों को सँजोये हुए है जैसे कोई डाक्यूमेंटरी फिल्म । उपन्यास के अंत में आभीर की चिठ्ठी ,जो वह देश के महामहिम को लिखता है एक बडा प्रश्न चिन्ह है व्यवस्था क्र नाम पर साथ ही वह नक्सलप्रभावी आदिवासी क्षेत्रों का पूरा पूरा लेखा जोखा है जो पाठकों की आँख खोलनेके लिए पर्याप्त है। आभीर जो सीधा सादा शिक्षक है , उसका लेना-देना सिर्फ गाँव वालों के दुख-दर्द से है। वह उनके दुख को आवाज देना चाहता है परंतु सत्ता के सौदागरों को उसका सच हजम नहीं होता आभीर को नक्सली करा कर दिया जाता है जो कि वास्तविकता से कहीं कोसों दूर है आभीर यह जानते हुए कि सत्ता की शक्ति के आगे वह कुछ नहीं कर सकता वह या तो हिरासत में यातनाएँ सहकर मरेगा या गोली से मार दिया जाएगा,अंत एक ही है मृत्य़ु। और आभीर भूमिगत हो जाता है ।उपन्यास में एक लम्बी बहस उन स्थितियों और मुद्दों पर है जिनकी वजह से प्रकृति प्रेमी भोले-भाले आदिवासी युवक या युवतियाँ हथियार उठाने पर मजबूर हैं । साथ ही सरकारी तंत्र ,स्कूलों ,स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर मनरेगा और अन्य सरकारी योजनाओं में होने वाले भ्रष्टाचार का भी बखूबी परिचय दिया गया है ।आभीर अंत में एक चिट्ठी लिखता है जो इन सब स्थितियों का कच्चा चिट्ठा है राष्ट्र के सर्वोच्च अधिकारी यानी महामहिम राष्ट्रपति के नाम।किंतु उसकी चिट्ठी का कोई जवाब नहीं है और उपन्यास एक बडा प्रश्न चिन्ह छोडकर समाप्त हो जाता है परंतु हम शहरातियों को सोचने पर मजबूर कर देता है। “कालचिती’ नाम की जगह पर केंद्रित यह उपन्यास काल में चिंता और बैचैनी की प्रबल धारा का परिचय देती है ।समस्या यह है कि आदिवासियों की तमाम समस्याओं को माओवादी या नक्सलवाद की तहफ धकेल दिया गया है ।जीवन की मूलभूत सुविधाओं से रहित इन लोगों से मनुष्य़ होने का अधिकार भी छीना जा रहा है।निरंतर उत्पीडन ने जिस जगह लाकर इन सीदे सादे वनवासियों को लाकर खडा कर दिया है वहाँ कोई रास्ता नहीं है वरन एक गहन अंधकार ही चारों और पसरा हुआ है ।यहाँ अलग अलग वय के सब लोग अपनी तरह से इस स्थिति को झेल रहे हैं लेकिन अपनी दैहिक सीमाओं के चलते स्त्रियाँ और किशोरियाँ जिस तरह के शोषण का शिकार हैं उसका बखान खास तौर पर उपन्यास की नायिका जमुना और सहनायिका बाहामुनि  के माध्यम से आदिवासी स्त्रियों पर पुलिस और प्रशासन के अत्याचारों की गाथा करती है ।

 उपन्यास के माध्यम से तह भी स्पष्ट होता है कि नक्सलवाद सिर्फ कानून और व्यवस्था का मामला भर नहीं और न ही यह केवल राजनीतिक समस्या है बल्कि गहन सामाजार्थिक संबंध इसके मूल में हैं । पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर बरसों बरस जिस वन पर आदिवासी जी रहे थे जिस जंगल पहाड और नदी को वे अपनी तरह से संरक्षित कर रहे थे एक झटके में इनको अपनी उस विरासत से बेदखल कर दिया गया है । खदानों और हीरों से भरी हुई इस धरती से उन्हें बेदखल कर सारा अधिकार पूँजीपतियों के हाथों में दे दिया गया है आम जन यहाँ मात्र श्रमिक है जिसके श्रम का पूरा पूरा फायदा पूँजीपति उठा रहे हैं निरंतर होते हुए हादसों ने यह साबित किया है कि आम आदिवासी के जीवन का कोई मोल नहीं है । गाँव के वयोवृद्ध टीका माँझी कहते हैं “देखा है सुना है जानता है।बाहर का लोग हमको धोका देता है,चाकर बँधुआ बनाता है,मारता है।हमारा चमडी से भाषा से ,जीने का ढंग से घिन्ना करता है।इसीलिए बहुत बार पहले हम लोग के साथ हुआ है ।तब भी हम लोग को करना पडा था।किया था।हम लोग को करना होगा करेगा...अपने भीतर को तैयार करो।धीरे धीरे सोचते रहोक्या कर सकते है?थाना पुलिस प्रशासन कहीं तुमको कानून नहीं मिलेगा तब क्या करेगा?कैसे और कहाँ से न्याय पाएगा?कौन तुमको आदमी मानेगा?अपना शक्ति और समझ को मजबूत करो समय आने दो...बाढ नहीं देगा तो बाघ घर में घुस आएगा।(पृ.103)

उपन्यास कथा मुख्य रूप से आभीर और जमुना और इन दोनों के परिकर में समाए लोगों के माध्यम से आदिवासियों की दुख-गाथा को कहती है ।इनके साथ बुद्धिजीवी संवेदनशीलता का पक्ष डॉ सिद्धार्थ रखते हैंजो  सचमुच बुद्ध की मानिंद विचारक जगत कल्याणकारी हैं यह बात दीगर है कि न्याय का पक्ष लेने के कारण अंत में उन्हें भी धमकी दी जाती है कि वह भी नक्सली मान लिये जाएँगे यदि चुप न रहे तो , उपस्थित हैं जिनके माध्यम से स्थितियों का जायजा लिया गया है। उपन्यास के रचना विधान में लगभग सभी पीढियों की गाथा-व्यथाओं को संजोया गया है । लघु कलेवर में भी यह उपन्यास जमुना के बूढे माता-पिता, ससुर,देवर जितेन, बेटे बीरेन,के साथ साथ टीका माँझी,सुगेन,मरांग आबा, सिंगो मासी,प्रबीन,बाहामुनि,छितामनी,पद्मा ,मरांग टोपनो,डोमन के माध्यम से लगभग सभी पीढियों की दुख गाथा कहता है । उम्मीद की किरणों की तरह उपन्यास में ईमानदार पत्रकार सुबोध हाँसदा और वकील दिवाकर मौजूद हैं । उपन्यास के अंत की तरफ बढने के साथ किसी एन.जी.ओ. से आई पढी लिखी युवतियाँ भी मौजूद हैं जो आदिवासी स्त्रियों पर पुलिसिया और फौजी अत्याचारों की रिपोर्ट लेने आईं हैं ताजा हवा की मानिंद हैं ।– जो यह विश्वास दिलाती लगती हैं कि कम से कम इनके दुख में कोई तो शामिल है ।

‘कालचिती’ उपन्यास एक उन स्थितियों और घटनाओं का गहन विश्लेषण करता है जिनकी वजहों से स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी है । आभीर के भूमिगत हो जाने बाद जमुना सोचती है”वर्तमान में ऐसे ही ज़ुल्म के कारण लडका लडकी बागी हो रहा है।दस्ता’ में भर्ती हो रहा है ।बचने का और लडने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है ।बेला,बाहा काहे गया? बेला के आने से क्या ये सब नहीं मालूम हुआ कि ऐसे ही कारण दस्ता वाला लोग बोलता है ,हमारा साथ मिलकर लडो।आदमी उनका बात सुनेगा,मानेगा।जंगल महाल में रहने वाला आदमी के घर में ,गाँव में वो लोग आयेगा तो भात देना होगा रहने को जगह भी देना होगा ।एक तो बंदूक हथियार का डर ।दूसरा वो लोग बोलता है तुम्हारी भलाई के लिए लड रहा।कैसे मदद नहीं करेगा आदमी?करेगा।नहीं करेगा तो भी पुलिस बोलता है,काहे हो मदद किया?तुम भी नक्सली! ए सब कुछ बर्बाद हो गया है ..सिर्फ शक और बदला के लिए ।सिर्फ आदिवासी को सताने और उसका सब कुछ छीनने के लिए।(पृ.13)”गाँव वालों को उठाकर उन्हें नक्सली साबित करने की मुहिम निरंतर जारी है ।बलवाईयों की तरह पुलिस और फौज आदिवासी गाँवों में घुसती है। कॉम्बिंग ऑपरेशन और सर्च के नाम पर निर्दोष  और सीधे सादे आदिवासोयों को पकड कर मारती है कि साल,केंदू पत्ते तोडने के लिए जंगल जाने वाले आदिवासियों को नक्सलियों का साथी बताया जाता है। यहाँ तक की स्कूल से लौटती किशोरियों बेला और बाहा को पुलिस पकड लेती है कि वह नक्सलियों कि इंफार्मर हैं 97 दिन बाद कोर्ट में जज भी जब यही फैसला देता है तो वे वहाँ से भाग निकलती हैं यही बेला और बाहा लडने के लिए हथियार थाम लेती है ।अखबारें इस बात का साक्षी हैं कि हर दिन किसी ग्रामीण क़ॆ साथ पुलिस फोटो खिंचवाती है और उसे एरिया कमाँडर घोषित किया जाता है ।गाँव वालों को ही नक्सली बता उनसे आत्मसमर्पण करवाने की न जाने कितनी रिपोर्टों से अखबार के पन्ने भरे रहते हैं ।निर्दोष ग्रामीणों को मारकर फर्जी मुठभेडें दिखाई जाती हैं ।‘कालचिती’ उपन्यास इन सबका कच्चा चिट्ठा खोलता है कि किस तरह पूर्व नक्सली जिनका आत्मसमर्पण करवाया जाता है उन्हें जिन सुविधाओं को देने की बात की जाती है वह भी नहीं दी जातीं। नक्सली होने के संदेह पर न जाने कितने आदिवासी युवा जेलों में बंद हैं जिनकी कोई सुनवाई नहीं ।उपन्यास पाठक को इन सारी स्थितियों का साक्षी बनाता है। अपनी ज़मीन पर कंपनी वालों के अधिकार के विरूद्ध बोलने पर प्रवीन मुंडा को गिरफ्तार कर लिया जाता है “प्रवीन मुंडा सरकारी स्कूल का साधारण चपरासी राज्य के खिलाफ संगीन गतिविधियाँ चलाने ,षडय6त्र रचने औअर गैरकानूनी रूप से हथियार रखने का आरोपी था।....प्रवीन के घर नक्सली साहित्य और देशी कट्टा कहाँ से आगया?..सब जान रहे थे यह एक चाल है ।(पृ.108)  निर्दोष बाहामुनि( प्रबीन की पत्नी) और जमुना(जो सही मायने में आभीर की मित्र है ) को नक्सलियों का साथी बताकर जिस तरह से बार बार हिरासत में लेकर जो यातनाएँ दी जाती हैं वह दिल दहलाने वाली हैं ।बाहामुनि पत्थर हो जाती है तो जमुना असहायता की लम्बी तीखी मन:स्थिति में  शिथिल हो जाती है उसके स्त्रीत्व को बार बार झिंझोडा जाता है ।फौजियों और पुलिस द्वारा वह उनके अपने पूर्वाग्रहों और आरोपों के साथ शारीरिक और मानसिक सतहों पर निरंतर रौंदी जाती है ।किंतु हार नहीं मानती। जो जिजीविषा का प्रतीक है।उपन्यास के अंत में यह अनुत्तरित है कि जब डैम के पास  जमुना को देखकर एस. पी. अमर्यादित आचरण करने को उद्ध्त होता है तभी जमुना उस पर खींचकर पत्थर मारती है। सिपाहियों का दस्ता जैसे ही गन पर उँगली रखता है कि पहाडियों से बेला का दस्ता फायरिंग कर देता है और वह सब अपनी जान बचाने के लिए छिप जाते है ऐसे में इस दोतरफा आक्रमण में जमुना मर जाती है या जीवित रहती है लेकिन एक सतत चल रहे संघर्ष का परिचय मिल जाता है ।

जिन आदिवासियों को आम शहरी जन पिछडा हुआ मानता है जब वह इस उपन्यास के माध्यम से उनकी समृढ परंपरा रीति रिवाज त्यौहार पकवान और व्यवहार के बारे में जानता है तब वह मानवीय संवेदना से भर उठता है । आभीर के शब्दों में”जमुना के ससुर को देखने पर उसे लगता आदिवासी समुदाय कितना सरल ह्रदय होता है। कितना भोला ...अपने काम में तल्लीन, धीर। मडैये के नीचे दिन भर बूढा कभी या तो खाट बीनता रहता,बाँस की खपच्चियों ।जमुना किससे बात कर रही है क्यों बात कर रही है कितनी देर तक बात कर रही है उससे उन्हें कुछ नहीं लेना देना।“ आदिवासी समुदाय स्त्री और पुरुष के सहज संबंध का पोषक है । वह नैतिक अनैतिक के नागरी मानदंडों से परे है लेकिल सहज सरल और मानवीयता का पोषक है । प्रकृति के बीच जीने वाला यह समुदाय समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं को समेटे हुए है ।छोटे से उपन्यास में शेखर मल्लिक ने स्थानीय वनस्पति ,प्राकृतिक-सुषमा, भाषा सभी का परिचय दे दिया है ।जैसे“यहाँ की ‘अपभ्रंश’ हिन्दी में केवल या ज्यादातर पुल्लिंग हिन्दी का इस्तेमाल होता है, शुद्ध स्त्रीलिंग सहित क्रिया का बोलचाल में खुद स्त्रियाँ ही आलस करती हैं,या उन्हें आता नहीं।‘यह इस बात का सबूत है कि आदिवासी समुदातय लिंग भेद को तवज्जो नहीं देता। भाषा किसी भी समाज का आईना होती है ।स्थानीय भाषा के अनेक शब्द उपन्यास में आए हैं जैसे बाँस की खपच्चियों के बनने वाले मोढा,सूप,चटाई के साथ साथ चाला(हँडिया छानने का बर्तन) खाँची (टोकरी),मुयू (मुर्गियाँ ढाँपने की बडी सी टोकरी),सुगाड(सुन्दर)परब चातु(कुकुरमुत्ते),दीशोन (देश) हान(बच्चा) आदि।उपन्यास में जगह जगह इस बात की ओर भी संकेत है कि आदिवासियों के संस्कार,संस्कृति, सभ्यता,त्यौहार भोजन बोली सब कुछ खत्म हो रहा है।साथ ही यहाँ के त्यौहारों करमा, टूसू,से लेकर मृतक संस्कार तक का प्रिचय दिया गया है ।छितामुनी, जो पढी-लिखी और सामाजिक आदिवासी कार्यकर्ता है और जिसे जिसे जमीन अधिग्रहण का अहिंसक विरोध करने पर भी हिंसक और खतरनाक बताकर पकडा जाता है,कहती है- “मैं समझ सकती हूँ कि कैसे हम मूलवासियों की पहचान ,उनकी विरासत,संस्कृति और हैरिटेज को ये लोग ,सरकार बडा कंपनी छीनना चाहते हैं”। शायद यही कारण है कि लेखक आदिवासी बोली ,वहाँ के शब्द और गीतों का उपन्यास में शामिल करता है । कुल मिलाकर उपन्यास इस बात का साक्षी है कि जो भी कुछ है वो आँखिन देखी है हाथीदाँत की मीनार में बैठकर नजारा नहीं लिया गया है
कालचिती पंचायत के पूर्व मुखिया टीका माँझी के माध्यम से लेखक कहता है-“ यह सीधी साफ घोषित लडाई नहीं छद्म अफवाहों और षडयंत्रों को हथियार बनाकर सीधे सीधे जनजातीय समाजों को अपनी जडों से उखाडने उनके आदिम आश्रयों से बेदखल कर देने,उनको नेस्ताबूद कर देने की कवायद थी।क्यों कि सीधी लडाई में आभिजात्य समाज को पहले कई बार मुँह की खानी पडी है”(पृ.84) यही कारण है कि शाँति वार्ता के रास्ते पार कोई नहीं चलना चाहता । नक्सलवाद से निपटने की सरकारी योजनाओं और उनसे निपटने के तरीके यानी क्रियांवयन में गहरा फर्क है । प्रशासन और पुलिस तीनों नक्सल समस्या को जीवित रख केवल अपना स्वार्थ पूरा करना चाह्ती है ।भ्रष्टाचार इतना हावी है कि कोई भी इस समस्या का समाधान नहीं चाहता।यही कारण है कि आदिवासियों का विश्वास व्यवस्था पर से ख्त्म हो गया है ।बिजली,पानी,सडक,शिक्षा,स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित आदिवासी उस दौर में पहुँच चुके हैं कि जाएँ तो जाएँ कहाँ ?भारत में सबसे ज्यादा शोषित वर्ग के तौर पर खेतीहर मजदूरों की गिनती होती है ,पर आदिवासी मजदूरों की हालत सबसे गई गुजरी है ।कर्ज़ भूमि से निष्कासन जबरन श्रम और निरक्षरताके कारण आदिवासी सबसे अधिक पीडित हैं ।1960 से लेकार अब तक आदिवासियों की समस्याओं पर लगभग एक सी ही बहस चल रही है और रास्ता कोई भी नहीं हैं।‘कालचिती’ उपन्यास की विशेषता इसी में है कि वह परंपरागत बहसों से परे आम पाठक को सोचने पर मजबूर कर देता है ।

उपन्यास – कालचिती-शेखर मल्लिक 

आर्य प्रकाशन मंडल, अंसारी रोड-नई दिल्ली मूल्य - 350/-